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फतेहपुर: 'साइकिल' चलाए रखने की चुनौती

लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो गई है और सभी दलों के सियासी योद्धा अपनी जीत सुनिश्चित करने में जुट गए हैं। उत्तर प्रदेश की फतेहपुर सीट की बात करें तो समाजवादी पार्टी (सपा) जहां इसे अपने पास बरकरार रखने के लिए पूरी कोशिश करने में जुटी है, वहीं बहुजन समाज पार्टी (बसपा) इस बार के चुनाव में राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी की झोली से सीट छीनने की तैयारी कर रही है।

हाशिए पर सिमटी कांग्रेस ने इस लोकसभा सीट पर छह बार प्रतिनिधित्व किया, लेकिन बाद में वह धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई। इसके अलावा जनता पार्टी, जनता दल, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दो-दो बार इस सीट पर काबिज हो चुकी है। निर्दलीय प्रत्याशी भी एक बार इसी सीट से विजयी हुए हैं।

आजादी के बाद हुए आम चुनावों पर नजर डालें तो वर्ष 1952 में शिवदत्त उपध्याय तथा 1957 में अंसार हरवानी ने बाजी मारी थी। इसके बाद वर्ष 1962 में चार प्रत्याशियों ने अपनी किस्मत आजमाई और निर्दलीय प्रत्याशी गौरी शंकर ने कांग्रेस के वी.वी. केशकर को पराजित कर दिया था। इसके बाद कांग्रेस के संतबख्श सिंह वर्ष 1967 और वर्ष 1971 में इस सीट से लोकसभा पहुंचे थे।

वर्ष 1977 के आम चुनाव में तथा 1978 के उपचुनाव में जनता पार्टी के क्रमश: बशीर अहमद और सैयद लिकायत हुसैन विजयी हुए थे। इसके बाद वर्ष 1980 तथा वर्ष 1984 में कांग्रेस के हरी कृष्ण शास्त्री ने इस सीट पर फिर से कब्जा कर लिया था। वर्ष 1989 एवं वर्ष 1991 में जनता दल के उम्मीदवार वी.पी. सिंह इस सीट से विजयी हुए थे।

वर्ष 1996 में बसपा के विशम्भर प्रसाद निषाद ने भाजपा को पराजित कर इस सीट पर जीत हासिल की थी, जबकि वर्ष 1998 और वर्ष 1999 में भाजपा से उम्मीदवार रहे डां. अशोक पटेल विजयी हुए थे। इन दोनों बार के चुनाव में बसपा दूसरे स्थान पर रही।

वर्ष 2004 में बसपा ने फिर से अपने प्रत्याशी का चेहरा बदला और महेंद्र निषाद भाजपा के मुकाबले जीत गए। वोटों के लिहाज से देखा जाए तो जनता पार्टी ने यहां से सबसे बड़ी जीत दर्ज की थी। वर्ष 1977 में पार्टी प्रत्याशी बसीर अहमद ने 78.6 प्रतिशत वोट हासिल करके कांग्रेस के प्रत्याशी संत बख्श सिंह को पराजित किया था। कांग्रेस महज 19.8 प्रतिशत वोट ही हासिल कर सकी थी, जबकि वर्ष 1971 चुनाव में कांग्रेस के संतबख्स सिंह ने 57.6 फीसदी वोट हासिल किए थे।

वर्ष 1999 के निर्वाचन में भाजपा के डां. अशोक पटेल वोट प्रतिशत में सबसे पीछे रहे। उन्हें महज 20.1 प्रतिशत वोट ही मिल सके थे। एक बार जहां निर्दलीय प्रत्याशी ने बाजी मारी वहीं दो बार वह दूसरे स्थान पर रहे। वर्ष 1952 में प्यारे लाल कुरील व वर्ष 1957 में उमाशंकर तथा वर्ष 1967 के चुनाव में बृजलाल वर्मा दूसरे स्थान पर रहे।

चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि आजादी के बाद कांग्रेस की जब हवा चल रही थी तो वर्ष 1952 और वर्ष 1957 के आम चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशियों ने ही उसे टक्कर दी थी। चुनाव में जहां तक उम्मीदवारों का सवाल है तो वर्ष 1996 में सर्वाधिक 55 प्रत्याशियों ने चुनावी समर में अपनी किस्मत आजमाई थी, जबकि वर्ष 1977 में महज तीन प्रत्याशी ही लोकसभा के चुनावी महासमर में किस्मत आजमाने के लिए मैदान में उतरे थे। प्रत्याशियों की संख्या वर्ष 1998 में घटकर आठ हो गई थी। लेकिन अगले वर्ष 1999 के उपचुनाव में इनकी संख्या बढ़कर दोगुनी हो गई थी।

मतदान प्रतिशत के लिहाज से आजादी के बाद पहले चुनाव में कुल 22.9 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि वर्ष 1984 में सर्वाधिक 50.9 फीसदी वोट पड़े थे। लोकसभा के पहले चुनाव में मतदाताओं की संख्या 3.55 लाख थी, जबकि वर्ष 2004 में इनकी संख्या बढ़कर 12.79 लाख हो गई थी।

इसके साथ वर्ष 2009 में मतदाताओं की यह संख्या बढ़कर 15 लाख से अधिक हो गई थी। इस बार अर्थात वर्ष 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में जनपद के 17 लाख 44 हजार 947 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेंगे। इनमें 7.93 महिला मतदाता भी शामिल हैं।

एक अहम बात यह है कि गत लोकसभा चुनाव की तिथि पर ही इस बार भी इस सीट पर मतदान व मतगणना होगी। पिछले चुनाव में अंकगणित का यह आंकड़ा सपा के लिए काफी भाग्यशाली साबित हुआ था। उस समय पहली बार सपा के लिए राकेश सचान ने यह सीट जीती थी।

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