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चाय चौपाल : आओ राजनीति करें

जमशेदपुर संवाददाता। देश की आधी आबादी यानि महिलाएं अब स्वावलंबन की ओर अग्रसर हैं। वे हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा और क्षमता के बल पर पुरुषों के कदम से कदम मिला रही हैं। राजनीति, खेल, शिक्षा, उद्यम और सेवा क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती जा रही है।

यह महिलाओं की इच्छाशक्ति और लगनशीलता का प्रतीक है कि आज ग्रामीण महिलाएं भी अपने पैरों पर खड़ी होकर अपनी जिम्मेदारियां बखूबी निभा रही हैं। ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ पर साकची के उत्कल एसोसिएशन स्थित हिन्दुस्तान के सिटी कार्यालय में ‘आओ राजनीति करें’ के तहत ‘चाय चौपाल’ का आयोजन किया गया।

इस चर्चा में वक्ताओं ने राजनीति में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया। उनका मानना था कि शासन की सुंदर नीति को ही राजनीति कहते हैं। इसके लिए शिक्षा के साथ-साथ अधिकारों के प्रति जागरूकता भी होनी चाहिए।

महिलाओं को ही करनी होगी पहलइस पर सभी महिलाएं एकमत दिखीं कि एक सशक्त महिला अन्य महिलाओं को जागरूक बना सकती हैं, लेकिन उसे पहल करनी होगी। महिलाओं को ही चाहिए कि वह घर-घर जाकर अन्य महिलाओं को अधिकारों के प्रति सजग बनाएं तभी राजनीति में उनकी भागीदारी बढ़ेगी।

पाकिस्तान में 17.5 प्रतिशत महिलाएं संसद में प्रतिनिधित्व कर रही हैं, जबकि भारतीय संसद में महज 10 प्रतिशत ही महिलाओं की भागीदारी है। यह चिंताजनक है, महिलाओं की भागीदारी बढ़ानी होगी।

आम चुनावों में महिलाओं की होगी महत्वपूर्ण भूमिकावक्ताओं ने कहा कि राजनीति में महिलाओं के लिए गुंजाइश न के बराबर है, लेकिन इस बार आम चुनावों में कई महिलाएं दिलचस्प भूमिका निभाने वाली हैं, जैसे ममता बनर्जी, जयललिता, मायावती, वसुंधरा राजे सिंधिया, उमा भारती और सुषमा स्वराज। लेकिन भारतीय राजनीति के इतहिास में कामयाब महिला राजनेताओं में भी अधिकांश वे ही नाम आते हैं, जिनका किसी न किसी सियासी घराने से ताल्लुक रहा है।

इसलिए राजनीति में एक आम महिला को भी आगे आना होगा, जो घरेलू व कामकाजी महिलाओं और युवतियों की समस्याएं नजदीक से समझती हो। भारी पड़ेगी महिला आरक्षण बिल की अनदेखीवक्ताओं ने दो टूक कहा कि महिला आरक्षण बिल की अनदेखी करने वालों को यह आम चुनाव भारी पड़ने वाला है क्योंकि हर बार महिला आरक्षण बिल की अनदेखी की जाती है।

वक्ताओं की मानें तो इस बार महिला प्रत्याशी को प्राथमिकता देने और महिला आरक्षण बिल को पारित कराने का वादा करने वालों को ही चुनने से बात बन सकती है। इस बात पर भी जोर दिया गया कि महिला वोटरों को परिवार के दबाव में आने के बजाय अपनी पसंद से वोट डालने के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए।

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