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बाधाओं को दी मात, ये हैं आज की महिलाएं

रांची। श्रेयसी मिश्रा। महिलाओं के लिए किसी भी दौर में स्थितियां आसान नहीं थीं। उनके सामने खुद को साबित और स्थापित करने की चुनौतियां आज भी उतनी ही हैं। लेकिन, हमारे बीच नई पीढ़ी की ऐसी महिलाओं की भी कमी नहीं है, जिन्होंने निहायत ही विपरीत परिस्थितियों को न सिर्फ अपने अनुकूल बनाया, बल्कि अपने परिवार को पहचान भी दिलाई। इन बेटियों के अभिभावकों, परिजनों, सहेलियों को लोग इनके नाम से जानते हैं।

गरीबी, भूख जैसी बेड़ियां इनके इरादों के आगे नाकाम हो गईं। न ही इन्हें आगे बढ़ाने में किसी आरक्षण की दरकार पड़ी। टुसू से रोशन हुआ गांवनई पीढ़ी की ऐसी जुझारू महिलाओं में तमाड़ प्रखंड के सलगाडीह गांव की टुसूमनी का नाम आता है। उसके अभिभावक आज भी लकड़ियां बेचकर घर चलाते हैं। दोनों निरक्षर हैं। लेकिन उनकी बेटी टुसूमनी वर्ष 2013 की झारखंड बोर्ड की इंटरमीडिएट की स्टेट टॉपर है। उसे कला संकाय में 76.4 प्रतिशत अंक हासिल हुआ।

छठी तक टुसूमनी रोज आठ किलोमीटर पैदल चलकर पढ़ने जाती थी। लालटेन की रोशनी में उसने मैट्रिक-इंटर की परीक्षा की तैयारी की। उसके गांव में आज भी एक भी घर में टेलीविजन नहीं है। फिलवक्त वह रांची वीमेंस कॉलेज से इतहिास में ऑनर्स कर रही है।

हौसलों से गरीबी को पछाड़ाः किशोरगंज में रहनेवालीं दो बहनें राखी तिर्की और मधु तिर्की कुश्ती के अखाड़े में प्रतिद्वंद्वियों को मात देती हैं। वहीं, अखाड़े से बाहर विपरीत परिस्थितियों और बाधाओं को। इनके माता-पिता आज भी मजदूरी कर, किसी तरह दो वक्त की रोटी जुटा पाते हैं।

राखी ने 2012 से कुश्ती का प्रशिक्षण लेना शुरू किया। पिछले दिनों उसने नेशनल जूनियर कुश्ती चैम्पियनशिप में सिल्वर मेडल जीता। वह मारवाड़ी कॉलेज से इंटरमीडिएट भी कर रही है। निशाना लक्ष्य परलोहरदगा के चितरीडारू गांव की प्रेरणा भगत तीरंदाजी में एक उभरता हुआ नाम है।

राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय मेडल उसके हिस्से आए हैं। साथ ही, सम्मान भी। एक गरीब किसान की इस बेटी ने कभी हालात का रोना नहीं रोया। तुर्की, बैंकॉक यूएसए में आयोजित तीरंदाजी प्रतियोगतिाओं में उसने हिस्सा लिया है।

2009 में आर्चरी कैडेट चैंपियनशिप में उसे ब्रांज मेडल हासिल हुआ। वह बीएस कॉलेज लोहरदगा से अंग्रेजी ऑनर्स लेकर बीए कर रही है। दिलाई अंतरराष्ट्रीय पहचानहॉकी खिलाड़ी बिगन सोय ने अपने परिवार का ही नहीं, देश का नाम भी अंतरराष्ट्रीय फलक पर रोशन किया। 2013 में जर्मनी में जूनियर हॉकी चैम्पियनशिप में भारतीय टीम पहली बार जीती। टीम को कांस्य पदक हासिल हुआ।

बतौर गोलकीपर बिगन की भूमिका इस जीत में अहम रही। चाईबासा के बंधगांव की रहनेवाली बिगन आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आती हैं। लेकिन इन परिस्थितियों ने कभी उसे मायूस नहीं किया। वह दो बार इंडिया कैंप कर चुकी है।

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