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आधी आबादी को स्वास्थ्य सुविधाओं का रोना

 एटा। ज्ञानेंद्र शुक्ला।  दुनिया भर में महिलाओं को अच्छी सुविधाएं एवं समाज में बराबर का हक दिए जाने की कोशशिें की जा रही है। इसके विपरीत जनपद की महिलाओं को मूलभूत सुविधाएं भी नहीं मिल पा रही है। प्रसव पीड़ित महिला का उपचार नहीं हो रहा है।

पूरे जनपद में सिर्फ एक ही महिला चिकित्सक है। वह भी सुविधाओं के अभाव का हवाला देकर उपचार करने से इंकार कर देती है। महिला डाक्टर न होने के कारण महिला चिकित्सालय की जिम्मेदारी भी पुरुष डाक्टर पर है। ऐसे में दुनिया भर में मनाए जा रहे महिला दिवस जनपद की महिलाओं के लिए सिर्फ रस्म अदायगी की तरह है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर जिले की आधी आबादी का स्वास्थ्य रामभरोसे देखने को मिला। कई बार महिला डाक्टरों की कमी को लेकर शासन को प्रस्ताव भेजे गए।

लेकिन अफसोस इस तरफ किसी जिम्मेदार जनप्रतिनिधि का ध्यान नहीं गया। हालत यह है कि जिला महिला चिकित्सालय में गरीब तबके का मरीज अपने हाल पर आंसू बहाने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहा। यहां एक महिला डाक्टर के कंधे पर जिले की आधी आबादी के स्वास्थ्य रक्षा की जिम्मेदारी है। 30 बेड के अस्पताल में न तो शशिु रोग विशेषज्ञ है न ही फामासिस्ट। हालत यह है कि शासन की तरफ से सृजित किए गए कुल 13 चिकित्सकों के पद में तीन की ही तैनाती है।

जिसमें एक पुरुष डाक्टर जो कि चिकित्साधीक्षक हैं वहीं दूसरे एनस्थीसिया का काम देखते हैं। महिलाओंे की समस्याओं के लिए एक स्त्री रोग विशेषज्ञ डा. अनीता सिंह हैं जिनकी तैनाती करीब दो वर्ष बाद हो सकी है। ऐसे में महिलाओं के स्वास्थ्य की दिशा में उठाए जा रहे कदमों की वशि्वसनीयता की पोल खुद ही खुल रही है। कई बार विभागीय स्तर पर शासन को महिला डाक्टरों व स्टाफ की कमी के विषय में बताया गया। लेकिन अभी तक शासन की तरफ से इस दिशा में कोई सार्थक प्रयास नहीं किए जा सके।

अफसोस इस बात का भी है कि जनप्रतिनिधियों को भी समस्या पता होने के बाद भी उनकी तरफ से कोई प्रयास न किया जाना दुखद है। गांव से आए महिला मरीजों के परिजन बेहतर इलाज के इंतजार में आते हैं लेकिन उनको निराशा ही हाथ लगती है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हिन्दुस्तान टीम ने महिला अस्पताल का जायजा लिया। इस अवसर पर प्रसूताओं के साथ अस्पताल में मौजूद आशा बहुओं व महिला तीमारदारों से बात की गई तो उनका दर्द बाहर आ गया।

सभी का कहना था कि गरीब आखिर इलाज के लिए कहां जाएं। एक सरकारी अस्पताल का सहारा है लेकिन यहां पर भी सरकारी सुविधाओं का टोटा है। चपरई निवासी आशा बहू संगीता ने कहा कि कई बार खून की कमी के चलते प्रसूता की जान चली जाती है। महिला डाक्टर की कमी के चलते सभी का समुचित इलाज नहीं हो पाता। एक डाक्टर के सहारे अस्पताल का संचालन बहुत मुश्किल है। रात में प्रसव पीड़ा होने पर किसी प्रकार का इलाज यहां नहीं है।

ऐसे में आगरा या अलीगढ़ मरीज ले जाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है। वार्ड में घुसते ही अपनी बहू के साथ आई बादामश्री ने कहा कि यहां न तो समय पर डाक्टर मिलते हैं न ही इलाज। जो दवाएं हैं भी तो उनके भरोसे बेहतर इलाज की कल्पना नहीं की जा सकती। वहीं पर अनारकली ने कहा कि गरीबों के लिए तो सरकारी अस्पताल का ही सहारा है। पैसे ही होते तो सरकारी अस्पताल क्यों आते। सरकार सिर्फ वादे करती है इस तरफ कोई ठोस उपाय नहीं है।

सुनीता ने कहा कि वह अपनी बहू के साथ आई है। उसे प्रसव होना था सुबह से डाक्टर का इंतजार कर रही है। एक बार आने के बाद कोई यहां झांकने तक नहीं आया। सुविधाएं क्या हैं यहां उसको नहीं मालूम। वार्ड में आधा दर्जन से अधिक प्रसूता मौके पर मिलीं। सभी की परेशानी यही थी कि डाक्टर देखने तक नहीं आतीं। कोई परेशानी हो तो किससे कहें। एक का कहना था कि उसे पेट में प्रसव के बाद गैस की समस्या है।

अभी तक उसे इस वजह से पीड़ा हो रही है। कोई दवा बताने वाला नहीं है। महिला अस्पताल के चिकित्साधीक्षक डा. बृजेश राठौर ने बताया कि डाक्टरों की कमी के कारण व्यवस्थाएं ठीक नहीं हो पा रहीं। कहीं न कहीं इलाज पर असर पड़ रहा है। कई बार स्टाफ की कमी को लेकर शासन को प्रस्ताव भेजा है। फोटो : नाम से संगीता चौहान, बादामश्री, अनारकली, सुनीता फोटो : 8 ईटीए 16 : महिला अस्पताल में जच्चा-बच्चा वार्ड में भर्ती प्रसूता।

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