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उन्हें महिला वोटों की चिंता तो है मगर..

महिला ‘वोट बैंक’ की तो चर्चा भी नहीं होती। हालांकि वोट बैंक चुनावों में एक अहम मुद्दा रहे हैं, इस बार भी हैं। जातियों के वोट बैंक, दलित वोट बैंक, युवा-बुजुर्ग वोट बैंक, व्यापारी वोट बैंक, विभिन्न आयवर्ग के वोट बैंक, सभी पर राजनीतिक दलों ने इन पर दांव लगाने शुरू कर दिए हैं। हर दल की संरचना में महिला प्रकोष्ठ या महिला विंग को आनुषंगिक संगठन का दर्जा मिला है। किसी भी दल ने पुरुष प्रकोष्ठ की तो रचना नहीं की है। महिलाओं को शक्ति स्वरूपा और देवी जैसे संबोधन भले ही मिले हों, पर उसकी सशक्त राजनीतिक हिस्सेदारी को वोट बैंक के रूप में संगठित करने की कोई कोशिश नहीं हुई। दिलचस्प बात यह है कि राज्यों के पिछले चुनावों में महिलाओं की मतदान में भागीदारी बढ़ी है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में 2007 में 46 प्रतिशत की तुलना में 2012 में 59.48 प्रतिशत महिला मतदाताओं ने, गोवा में 2007 में 70.24 प्रतिशत के मुकाबले 2012 में 81..47 प्रतिशत महिलाओं ने मताधिकार का प्रयोग किया। महिलाओं के मतदान में वृद्धि की यह प्रवृत्ति प्राय: सभी राज्यों में दिखी है। इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र संघ की ‘मिलेनियम डेवलपमेंट रिपोर्ट-2012’ का यह तथ्य हमें कुरेदता है कि 62 करोड़ से ज्यादा भारतीयों को, जिनमें महिलाओं की तादाद 50 फीसदी से अधिक है, शौचालय की मूलभूत सुविधाएं भी नहीं उपलब्ध हैं।

साफ है, देश की राजनीतिक प्रक्रिया में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बावजूद उनकी मूलभूत जरूरतों और समस्याओं की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। हां, इस बार यह जरूर हुआ है कि नारीवादी महिला संगठनों ने ‘महिला वोट बैंक’ का मुद्दा उठाया है। 2014 के आम चुनाव में 49 प्रतिशत महिला वोटर हैं। संख्या बल के बूते वैसे तो सारे चुनाव की तस्वीर बदलने की ताकत इनकी मुट्ठियों में है, लेकिन ऐसा कोई सूत्र या फैक्टर नहीं तैयार हो सका, जो इस ताकत को एक मजबूत धागे से बांध सके। इन दिनों फिल्म गुलाब गैंग कई कारणों से चर्चा में है। यह फिल्म उत्तर प्रदेश के बांदा के गुलाबी गैंग की कहानी पर आधारित है या उससे प्रभावित है। इस गैंग ने इलाके की महिलाओं को एक सूत्र में बांधने का काम किया था। एक सीमित अर्थ में हमें महिला वोट बैंक के दर्शन सिर्फ यहीं होते हैं। यह छोटा-सा उदाहरण है कि महिलाएं किस तरह संगठित होकर महिला के रूप में वोट दे सकती हैं। अन्यथा वे आमतौर पर परिवार या जाति समुदाय के सदस्य के तौर पर ही वोट देती हैं। इसलिए महिलाओं को प्रभावित करने वाले मुद्दे आम तौर पर रसोई गैस की सब्सिडी बढ़ाने, साड़ी, दुपट्टा, प्रेशर कुकर, मिक्सर-ग्राइंडर, कलर टीवी वगैरह बांटने तक सीमित होते हैं। ऐसी कोशिशें किसी महिला वोट बैंक के अधिकारों की दिशा में नहीं जातीं, बल्कि वे परिवार के सदस्य के तौर महिला वोटर को लुभाने की कोशिश भर होती हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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