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बात का बतंगड़

जब माहौल शक और आशंकाओं से भरा हो, तो कैसे छोटी-छोटी बातें भी बड़ा रूप धारण कर लेती हैं, इसका उदाहरण मेरठ के एक छात्रावास के कश्मीरी छात्रों पर देशद्रोह का आरोप है। यह एक क्रिकेट मैच के दौरान कुछ छात्रों द्वारा पाकिस्तानी क्रिकेट टीम की जीत पर खुशी मनाने का एक छोटा-मोटा मामला था, जो विश्वविद्यालय और पुलिस-प्रशासन की अतिरिक्त सक्रियता की वजह से राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय मसला बन गया, जिसमें पाकिस्तान सरकार और भारत के स्थायी दुश्मन लश्कर-ए-तैयबा प्रमुख हफीज सईद जैसे लोग भी कूद पड़े। यह तो साफ है कि विश्वविद्यालय और पुलिस ने इन छात्रों पर जरूरत से ज्यादा सख्त कार्रवाई की, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि कुछ ही वक्त पहले मुजफ्फरनगर में भयानक सांप्रदायिक दंगे हो चुके हैं और उनके डर की छाया इन छात्रों के खिलाफ कार्रवाई में दिखाई पड़ती है। स्थानीय भाजपा नेता भी इस जंग में कूद पड़े और शायद उनका दबाव ही था कि कश्मीरी छात्रों पर देशद्रोह की धारा लगा दी गई। यह अच्छा हुआ कि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से बात की और उसके तुरंत बाद देशद्रोह की धारा हटा ली गई। उम्मीद करनी चाहिए कि यह मामला अब और नहीं बिगड़ेगा।

भारत में कुछ कानून ऐसे हैं, जो बहुत सख्त हैं और जिनका गलत इस्तेमाल आसानी से होता है। इनमें सरकारी गोपनीयता से जुड़ा कानून और देशद्रोह से संबद्ध कानून भी हैं। ये कानून अंग्रेजी उपनिवेशवाद की विरासत हैं और इनका दुरुपयोग अब भी होता है। भारत में कार्टून बनाने से लेकर पाकिस्तानी क्रिकेट टीम की हौसला अफजाई करने के लिए देशद्रोह की धारा लग सकती है। ऐसे मामलों में स्थानीय राजनेता सस्ती लोकप्रियता पाने या बवाल मचाने के लिए थाने के पुलिस वालों पर दबाव डालते हैं और इतना गंभीर आरोप किसी पर लग जाता है। सुप्रीम कोर्ट हालांकि यह कह चुका है कि देशद्रोह के आरोप के लिए सिर्फ किसी किस्म की बयानबाजी काफी नहीं है, बल्कि ठोस षड्यंत्र का होना भी जरूरी है, लेकिन इसका इस्तेमाल निहायत अगंभीर तरीके से होता है। हमारा देश इतना कमजोर तो कतई नहीं है कि कुछ नासमझ छात्रों की बचकानी हरकत से उसे खतरा पैदा हो जाए, न ही क्रिकेट में एक मैच हारने से भारत की एकता और अखंडता पर आंच आने वाली है।

जब काफी दिनों बाद भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच शुरू हुए थे, तब जरूर भारत-पाकिस्तान मैचों के दौरान माहौल तनावपूर्ण हो जाता था, लेकिन उसका लंबा अरसा हो गया है और अब ज्यादातर भारतीयों और पाकिस्तानियों ने खेल को खेल की तरह देखना सीख लिया है। इस प्रकरण ने पुरानी रंजिशों को बेवजह हवा दे दी है और दोनों पक्षों के उग्रवादियों को आग भड़काने का मसाला दे दिया है। जिस विश्वविद्यालय में यह घटना घटी, उसके अधिकारियों को ज्यादा परिपक्वता और समझदारी से यह मसला सुलझाना था। लेकिन शायद उसके अधिकारी डरे हुए होंगे कि यह मसला ज्यादा बड़ी आग न भड़का दे। सामान्य परिस्थिति होती, तो इसे आंतरिक मामला मानकर सुलझाया जा सकता था, लेकिन अतीत में दंगे और भविष्य में चुनावों के मद्देनजर आग लगाने वाले लोग इसमें सक्रिय हो सकते थे। कश्मीर मसला नाजुक समस्या है, लेकिन इसे बिगाड़ने का उपक्रम हमारे यहां चलता रहता है। इन छात्रों ने ज्यादा से ज्यादा एक नासमझी भरी भूल की है, लेकिन इसके लिए उनका करियर नहीं बिगड़ना चाहिए। उन्हें वापस विश्वविद्यालय में लाकर सुरक्षा के साथ पढ़ने का इंतजाम किया जाना चाहिए।

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