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दौरे का मकसद

नेपाल के प्रधानमंत्री अपने समान पदासीन शख्सियतों में शायद सबसे पहले हैं, जो सरकार गठन के तुरंत बाद विदेश दौरे पर गए। प्रधानमंत्री सुशील कोइराला के साथ विदेश मंत्री व दूसरे सरकारी अधिकारी भी बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी-सेक्टोरल टेक्नीकल ऐंड इकोनॉमिक को-ऑपरेशन समिट के लिए म्यांमार गए थे। लेकिन उनकी यात्रा से पहले ही मीडिया ने यह कहा कि वह भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलने के लिए म्यांमार जा रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, कोइराला अपनी यात्रा में कम से कम सरकारी धन खर्च करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने इकोनॉमी क्लास का सफर चुना, पर उनके सहयोगियों ने उन्हें बिजनेस क्लास में सफर करने को मजबूर किया। शायद सुरक्षा व अन्य कारणों के चलते यह फैसला लिया गया। किंतु क्या यह दौरा जरूरी था? कोइराला की यह यात्रा गैर-जरूरी हो सकती है, पर वह देश के पीएम हैं, इसलिए वह यात्रा को उचित ठहराने में सक्षम हैं। लेकिन क्या वहां वह सिर्फ क्षेत्रीय समूह की अध्यक्षता के मकसद से गए थे? सात देशों के इस समूह की अध्यक्षता एक देश से दूसरा देश अल्फाबेटिकल ऑर्डर से करता है। ऐसे में, प्रधानमंत्री कोइराला वहां नहीं होते, तब भी नेपाल का नंबर आता ही। सामान्य समय में ऐसे दौरे उचित ठहराए जा सकते हैं, पर नेपाल मुश्किल दौर से गुजर रहा है।

थाईलैंड भी मुश्किल में है, इसलिए उसकी प्रधानमंत्री शिनेवात्र म्यांमार दौरे पर नहीं गईं, जबकि इस शिखर बैठक की नींव थाईलैंड में ही पड़ी थी। थाई अधिकारियों ने म्यांमार में थाईलैंड का प्रतिनिधित्व किया। 1997 में जब बीआईएमएसटीईसी का गठन हुआ था, तब इसका नाम था बांग्लादेश-भारत-श्रीलंका-थाईलैंड इकोनॉमिक को-ऑपरेशन (बीआईएसटी-ईसी) रखा गया। इस सदी की शुरुआत में नेपाल और भूटान इससे जुड़े और तब जाकर इसका मौजूदा नाम अस्तित्व में आया। इन सात देशों में म्यांमार व थाईलैंड ही दो ऐसे देश हैं, जो सार्क संगठन में शामिल नहीं हैं। वहीं इसमें सार्क के सदस्य देश अफगानिस्तान, पाकिस्तान और मालदीव नहीं हैं। क्षेत्रीय कूटनीति में सदस्यों का ऐसा चुनाव संदेह की स्थिति को पैदा करता है।  
द काठमांडू पोस्ट, नेपाल

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