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राजनीति में महिलाएं पूरी भागीदारी अभी भी सपना

देश के राजनीतिक परिदृश्य में शुरू से महिलाओं की मौजूदगी कम बेशक रही है, परंतु आज का सच यह है कि महिलाओं में राजनीतिक चेतना का विकास तेजी से हो रहा है जिसका प्रमाण है पिछले कुछ चुनावी आंकड़े। आज जानिए कि देश की आधी आबादी राजनीति के क्षेत्र में कहां है और अभी उसे कितनी दूरी तय करनी है आधी आबादी के कथन को पूरी तरह चरितार्थ करने में।

देश में आधी आबादी राजनीति में अभी भी हाशिये पर है। यह तब है जबकि यहां जितनी भी महिलाओं को राजनीतिक के निचली पायदान से ऊपरी पायदान तक जितना भी  जब भी मौका मिला, उन्होंने अपनी काबीलियत की छाप छोड़ी। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण दिलाने के लिए लाया गया महिला आरक्षण विधेयक कुछ पार्टियों के रवैये के चलते सालों से लंबित पड़ा है। इससे ज्यादा अफसोस इस बात का होता है कि राष्ट्रीय पार्टियां भी 10-15 फीसदी से अधिक महिलाओं को लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं देती हैं। यही नहीं, राजनीतिक भागीदारी की अहम प्रक्रिया मतदान में भी महिलाएं अपने परिवार के पुरुषों की राय के मुताबिक मतदान करती रही हैं, लेकिन बढ़ते शहरीकरण और शिक्षा इस मामले में महिलाएं स्वतंत्र निर्णय लेने लगी हैं।

इन सभी कठिनाइयों और परेशानियों के बावजूद देश की महिलाएं राजनीति में न सिर्फ आगे आईं बल्कि उन्होंने राजनीतिक पार्टियों और सरकारों को नेतृत्व भी दिया। संसद और विधानसभा में गंभीर मुद्दों पर अपनी बात रखी और उचित निर्णय लिए। देश की आम औरतें भी चुनाव पर अपना लगातार असर डाल रही हैं। पिछले दो साल में हुए विधानसभा चुनावों में अधिकतर राज्यों में मतदान करने के मामले में महिलाएं पुरुषों आगे ही रही हैं।

राजनीति में पुरुषवादी सोच
भारतीय राजनीति में अभी भी पुरुषवादी सोच ही हावी है। हर पार्टी ‘आम आदमी’ की बात करता है, आम औरत के बारे में तो कोई सोचता तक नहीं है। सियासती दलों के एजेंडे में महिला और महिलाओं के मुद्दे काफी पीछे आते हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि महिलाओं को देश में कोई भी पार्टी वोट बैंक के तौर पर नहीं मानती है। इन दलों का मानना है कि महिलाएं अपने घर के पुरुषों के मुताबिक ही मतदान करती हैं। हालांकि कई बार पार्टियां महिलाओं को लुभाने की कोशिश करती हैं।

प्रमुख पदों पर पहुंची महिलाएं
स्वतंत्रता से पहले ही देश में पहली बार 1917 में महिलाओं को राजनीति में भागीदारी की मांग उठी थी, जिसके बाद वर्ष 1930 में पहली बार महिलाओं को मताधिकार मिला। हमारे देश में महिलाएं बेशक राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, लोकसभा में विपक्ष की नेता और लोकसभा अध्यक्ष के साथ-साथ अन्य कई महत्वपूर्ण राजनीतिक पदों पर आसीन रही हैं, लेकिन राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में अधिक सुधार नहीं हुआ।

50 वर्ष लगेंगे संतुलन बनाने में
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत जैसे देशों में यदि महिलाओं की भागीदारी इसी तरह से कम रही तो लिंग असंतुलन को पाटने में 50 वर्ष से अधिक लगेंगे। हालांकि एक उम्मीद की किरण यह है कि महिलाएं अब अपने मताधिकार का अधिक इस्तेमाल करने लगी हैं।

महिला आरक्षण विधेयक
राजनीतिक पार्टियां वर्षों से लंबित पड़े महिला आरक्षण विधेयक को पारित कराने को लेकर भी उत्सुक नहीं हैं। यह विधेयक अब तक चार बार संसद में पेश किया जा चुका है, लेकिन पारित नहीं हुआ है। इस विधेयक के कानून बनने के बाद लोकसभा की 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी। इस विधेयक को लेकर कुछ पार्टियों में हिचक है। उनका तर्क है कि इससे शहर और उच्च समाज की महिलाओं का संसद में दबदबा हो जाएगा और ग्रामीण क्षेत्र की महिला हाशिए पर रहेगी।

जी, मुख्यमंत्री जी!
मौजूदा दौर में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन जे. जयललिता ने चौथी बार शासन संभाल कर रिकॉर्ड कायम किया है। हालांकि, वह पिछली तीन बार मुख्यमंत्रित्व काल पूरा नहीं कर पाई थीं। वहीं मायावती भी चार बार कुर्सी संभाल चुकी हैं और उनकी पिछली पारी पूरे पांच साल चली थी। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री जरूर लगातार पंद्रह वर्ष तक कुर्सी पर विराजमान रहीं और रिकॉर्ड कायम किया।

राजनीति में धाक जमाने वाली
इंदिरा गांधी

इंदिरा गांधी भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। वह वर्ष 1966 से 1977 तक लगातार तीन बार प्रधानमंत्री रहीं। इसके बाद चौथी बार वर्ष 1980 से 1984 तक इस पद पर रहीं। उनकी उपलब्धि में हरित और श्वेत क्रांतियां रहीं, जिनकी वजह से देश खाद्यान्न और दूध उत्पादन में देश आत्मनिर्भर बना। वर्ष 1975 में देश में आपातकाल की घोषणा के बाद हुए चुनाव में वह हारीं, लेकिन तीन साल बाद उन्होंने सत्ता में वापसी की।

सुचेता कृपलानी
वर्ष 1963 में सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। सुचेता स्वतंत्रता सैनानी के साथ संविधान सभा के लिए चुनी जाने वाली कुछ महिलाओं में शामिल थीं। इसके अलावा वह कई उपसमितियों में भी शामिल रहीं जिन्होंने स्वतंत्र भारत का संविधान तैयार किया।

विजयलक्ष्मी पंडित
वर्ष 1953 में विजयलक्ष्मी पंडित संयुक्त राष्ट्र संघ आमसभा की पहली भारतीय और महिला अध्यक्ष बनी थीं। वर्ष 1962-64 के दौरान वह महाराष्ट्र की राज्यपाल भी रहीं। वर्ष 1964-68 तक विजयलक्ष्मी उत्तर प्रदेश के फूलपुर से लोकसभा सदस्य भी रहीं।

सरोजनी नायडू 
आजादी से पहले सरोजनी नायडु संयुक्त प्रांत की राज्यपाल थीं। आजादी के बाद भी वह राज्य की गवर्नर रहीं यानी वह स्वतंत्र भारत की पहली महिला राज्यपाल थीं। आजादी से पहले वह कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष भी रहीं। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लिया था। सरोजनी नायडू को ‘भारत कोकिला’ भी कहा जाता है।

सोनिया गांधी
वर्ष 1998 से सोनिया गांधी लगातार कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष हैं। इटली में जन्मीं सोनिया संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की भी अध्यक्ष हैं। पहले वह राजनीति में नहीं आना चाहती थीं, लेकिन अब वह लगातार 15 वर्ष से अधिक से कांग्रेस की अध्यक्ष के तौर पर काम कर रही हैं। सूचना अधिकार कानून और मनरेगा लागू कराने में उनकी बड़ी भूमिका रही है।

सुषमा स्वराज
सुषमा स्वराज लोकसभा में विपक्ष की नेता हैं। वह छह बार सांसद और तीन बार विधायक चुनी गई। सुषमा वर्ष 1998 में दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी थीं और उनका कार्यकाल मात्र दो महीने का रहा। वह वाजपेयी सरकार में भी मंत्री थीं। पेशे से वकील रहीं सुषमा ने वर्ष 1977 में हरियाणा से करियर की शुरुआत की थी।

मायावती
बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। वर्तमान में जब वह प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं हैं तब भी उनका असर यूपी की राजनीति पर साफ देखा जा सकता है। वर्ष 1977 में बसपा के संस्थापक कांशीराम ने मायावती को राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया था।

ममता बनर्जी
ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री हैं। उन्होंने राज्य से वाम दलों के 34 वर्षीय राज को खत्म किया। वह देश की पहली महिला रेल मंत्री भी रही। उन्होंने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से की। वर्ष 1997 में अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी।

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