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महिलाओं के जज्बे से बंजर में भी फसल

झारखंड के गुमला जिले में बंजर जमीन पर सामूहिक खेती कर जनजातीय महिलाएं आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन रही हैं। इससे उनके जीवन में बदलाव तो आया ही है, उन्हें घर-परिवार की कई समस्याओं से भी मुक्ति मिल गई।

कैसे की शुरुआत: बदलाव की यह बयार जिले के घाघरा इलाके में बही है। नवाटोली, खटंगा, करंज, परसा समेत आसपास के गांवों में महिलाएं जूही, चंपा, चमेली, अलबेला, गुलाब कलश और महिला मंडल का गठन कर स्वरोजगार के अवसर तलाश रही थीं। हर मंडल में 30-30 महिलाएं थीं। कई बार की बैठकों के बाद उन्होंने कृषि को रोजगार के रूप में अपनाने का निर्णय किया और बेकार पड़ी जमीनों पर गेहूं और गन्ने की खेती करने की योजना बनाई।

सिंचाई का ढूंढा हल: महिलाओं के लिए यह आसान नहीं था। फिर भी पहले उन्होंने अपने परिजनों को खेती के लिए राजी किया। सामने सिंचाई की समस्या भी थी। महिला मंडल से जुड़े शोभा लकड़ा, शांति मिंज, पूनम देवी, जुगिया उरांइन बताती हैं कि जिला प्रशासन से बात कर गांवों में माइक्रोलिफ्ट (छोटे-छोटे पानी के स्रोतों से पानी खींचने की व्यवस्था) का निर्माण कराया गया। इससे खेती से जुड़ने वाली महिलाओं का हौसला बढ़ा और उन्होंने 35 एकड़ में गेहूं की फसल लहलहा दी। महिलाओं ने गेहूं के अलावा गन्ने की भी खेती की।

चार साल से काम जारी: यह सिलसिला पिछले चार साल से जारी है। गेहूं और गन्ने की फसल ने गरीब महिलाओं की जिंदगी में समृद्धि की मिठास ही नहीं घोली, बल्कि इससे उनका सम्मान भी बढ़ा है।

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