DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सोच-समझ कर मारें वोट की चोट

सोच-समझ कर मारें वोट की चोट

यह मौका था देश के सबसे बड़े चुनावी संग्राम पर खुल कर बात करने, विचारों को जानने, युवाओं की नब्ज टटोलने, भारत को आदर्श लोकतंत्र के तौर पर स्थापित करने और चुनावों में मीडिया की कार्यशैली पर जनता का रुख जानने का.. हिन्दुस्तान ने फेसबुक पर पाठकों की उम्मीदों, मन में उमड़ते-घुमड़ते सवालों को निर्विवाद तौर पर वर्चुअल दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मंच पर साझा किया प्रधान सम्पादक शशि शेखर के साथ

सामान्य घरों की महिलाएं राजनीति में सक्रिय होने से क्यों बचती हैं? चुनाव के वक्त ही हमारे नेताओं को एजेंडा कहां से मिल जाता है? क्या हमारा देश वैकल्पिक राजनीति के लिए तैयार है? क्या वैकल्पिक राजनीति का मतलब सिर्फ और सिर्फ सत्ता परिवर्तन से है?..फेसबुक पर ‘आओ राजनीति करें’ पेज पर सवाल दर सवाल बरस रहे थे। घरेलू-कामकाजी महिलाएं, बुजुर्ग, कॉलेज के छात्र-छात्राएं, कॉरपोरेट कर्मी, समाजसेवी सहित लगभग हर वर्ग से राजनीति के धारदार सवाल आए। हिन्दुस्तान के प्रधान सम्पादक एक दोस्त, एक पत्रकार और एक मतदाता के तौर पर फेसबुक पर सबसे मुखातिब थे। दिन में डेढ़ घंटे चले इस सवाल-जवाब में सैकड़ों लोगों ने हिस्सा लिया। वहीं शेयर और लाइक करने वालों की संख्या ने भी हजार का आंकड़ा छू लिया।

‘आओ राजनीति करें’ के अभियान को लेकर लोगों में जोश-खरोश किस कदर था कि शाम चार बजे हमारे फेसबुक संवाद के इस अभियान को शुरू होना था, मगर सुधी पाठक दोपहर से ही इसका इंतजार कर रहे थे। प्रधान सम्पादक ने जैसे ही पहले सवाल का जवाब दिया उसके बाद तो जिज्ञासाओं और समाधान का सिलसिला चल पड़ा। पटना, रांची, दरभंगा, भागलपुर, मेरठ, मुरादाबाद, दिल्ली समेत देश के कोने-कोने से हर तबके के लोगों ने हिन्दुस्तान के  ‘आओ राजनीति करें’ के मंच पर बेबाकी से अपनी राय रखी और राजनीतिकों के लिए भी कुछ मुद्दे रखे। कोई महिला सुरक्षा व आरक्षण को लेकर चिंतित था, किसी ने सियासत में युवाओं की भागीदारी से लेकर गठबंधन की राजनीति व पेड न्यूज पर खुल कर सवाल पूछे।

बहरहाल, डेढ़ घंटे के इस संवाद में पल-पल सवालों का सिलसिला बढ़ता जा रहा था। जवाबों के प्रतिप्रश्न भी फौरन आ रहे थे। मौजूदा राजनीति में तीसरे मोर्चे की संभावनाओं को लेकर पाठक भी उत्सुक दिखे। पहला सवाल मेरठ से शक्ति सिंह चौहान ने तीसरे मोर्चे की सरकार बनने को लेकर पूछा। प्रधान सम्पादक का जवाब था, ‘121 करोड़ की आबादी में प्रधानमंत्री पद के लिए 21 उम्मीदवार क्यों नहीं हो सकते?’ तपाक से अगला सवाल दागा गया, ‘आम आदमी की इन चुनावों में भूमिका क्या है?’, जवाब मिला ‘भूमिका सर्वोपरि है, इसलिए आपसे अपील कर रहे हैं कि सोच-समझ कर वोट की चोट मारें।’ उसके बाद तीखा सवाल बिहार से शिशिर राय ने पूछा, ‘अखबार सत्ताधारी पार्टी के झूठे वादों और उपलब्धियों का बखान क्यों करता है?’, जिम्मेदारी भरा उत्तर सामने आया, ‘बेहतर होगा कि आरोप लगाने से पहले उस बाबत प्रमाण प्रस्तुत करें।’ भ्रष्टाचार को लेकर पाठकों में गुस्सा साफ दिखा। बोधगया से जाकिर हुसैन ने पूछा, ‘सभी पार्टियां भ्रष्टाचार के विरुद्ध दिख रही हैं। क्या बदलाव दिखेगा और अगर दिखेगा तो कब?’ जवाब दिया गया, ‘पांच हजार से अधिक वर्ष पुरानी सभ्यता में बदलाव रातों-रात नहीं होते। उम्मीद है आज नहीं तो कल हमारे और आपके प्रयास कामयाब होंगे।’ वहीं ओमसुधा ने मुस्लिम वोट बैंक का सवाल उठाते हुए पूछा कि कब तक मुस्लिमों का इस्तेमाल वोट बैंक के तौर पर किया जाएगा? इस गंभीर सवाल पर उन्होंने संजीदगी से जवाब दिया, ‘मैं समझता हूं कि उन्हें वोट बैंक मानना सही नहीं है। बदलाव जरूर आएगा।’ इतना ही नहीं, चुनावों में मीडिया की भूमिका, शख्सियत में नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल और राहुल गांधी को लेकर भी लोगों में उत्सुकता दिखी।

गांव हमेशा चुनावी मुद्दे बने रहेंगे
मुरादाबादा से लीनी नैयर पूछती हैं कि क्या मौजूदा राजनीतिक हालात में चुनाव आयोग ने सुधार के लिए कोई कारगर उपाय किए हैं? जवाब मिला कि सुधार की नहीं, बल्कि लोगों की नीयत में बदलाव की जरूरत है। मेरठ से रमन त्यागी ने पूछा कि अब चुनावों में गांव के मुद्दे नहीं उठाए जाते? उन्होंने जवाब दिया कि कि देश में गांव कभी समाप्त नहीं हो सकते हैं। उनके मुद्दे उठाए जाते हैं। इस दफा आप भी उठाएं।

चाल, चरित्र और चेहरा बदलें
बिहार से मिथिलेश सिन्हा ने पूछा कि राजनीति में बदलाव कैसे होगा? उत्तर आया कि लोकतंत्र की परिभाषा यही है कि जैसी प्रजा, वैसे शासक। क्यों न हम नेताओं को गाली देने की बजाय उनका चाल, चरित्र और चेहरा बदलने की कोशिश करें।

रास्ता खुद बनाएंगे
डॉ. कुणाल सिंह ने चुनावों को लेकर अपनी निराशा जताई, उन्होंने कहा कि चुनाव नौटंकी बन कर रह गए हैं? जवाब मिला कि कुणाल जी निराश न हों, भारत ने हमेशा दुनिया को रास्ता दिखाया है और हम आगे भी उनके लिए रास्ता खुद बनाएंगे।

अगली पीढ़ी के नेता मांग रहे हैं वोट
एक पाठक ने पूछा कि पार्टियों में जेनरेशन गैप आ गया है, इसलिए अब देश की कमान युवाओं को दे देनी चाहिए? जवाब था कि युवा देश में बदलाव ला रहे हैं। सभी पार्टियों में अगली पीढ़ी के नेता ही वोट मांग रहे हैं। मेरठ से अमित कुमार ने ‘आप’ के संदर्भ में सवाल पूछा कि क्या दिल्ली विधानसभा के परिणाम देश की राजनीति को बदल रहे हैं? जवाब आया कि इसके लिए हमें लोकसभा के चुनाव परिणाम का इंतजार करना होगा।

पेड न्यूज अपराध की श्रेणी में हो
झारखंड से नदीम अख्तर ने पूछा कि मैं बहुत ही विनम्रता के साथ यह जानना चाहता हूं कि क्या किसी समाचार के बदले मीडिया को रकम अदा करने (पेड न्यूज) की परिपाटी का आप समर्थन करते हैं या नहीं? दूसरा और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या आपको यह नहीं लगता कि एग्जिट पोल पर अदालती पाबंदी के बावजूद प्री—पोल सर्वे कराना और उसका प्रकाशन—प्रसारण करना अपराध की श्रेणी में आता है? क्या सर्वे के माध्यम से किसी खास राजनीतिक दल अथवा शख्सियत के पक्ष में जनमत खड़ा करने की कोशिश करना अपने आप में नैतिक भ्रष्टाचार का हिस्सा नहीं है? अगर है, तो मीडिया, खासकर प्रकाशन—प्रिंट मीडिया का यह दायित्व नहीं कि वह भेड़चाल से अलग हट कर ऐसे सर्वे का प्रचार न करे और लोगों को शिक्षित करने वाले लेखों का प्रकाशन करे। धन्यवाद। आपको भी मेरा अभिवादन यकीनन आपने आज सुबह का हिंदुस्तान पढ़ा होगा हमारा संकल्प है कि हम समाचार की पवित्रता से कोई समझौता नहीं करेंगे। हम पेड न्यूज के खिलाफ हैं। जहां तक चुनावी सर्वे की बात है हिन्दुस्तान अपना कोई सर्वे नहीं करवाता। हमारा ‘आओ राजनीति करें’ अभियान भी पाठकों को जागृत करने की उद्देश्य से चलाया जा रहा है। आप भी इसका हिस्सा बनें। और रही बात पेड न्यूज का तो इसे अपराध की श्रेणी में होना चाहिए।

लड़कियां आगे आएं
महिलाओं के रोजगार व अन्य मुद्दों को लेकर मेरठ से मीना गुप्ता ने सवाल पूछा कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के बावजूद रोजगार नहीं बढ़े हैं, ऐसा क्यों? उत्तर आया कि मेरी बेटी भी नौकरी करती है। मैं चाहता हूं कि सभी लड़कियां आगे आएं और अपनी प्रतिभा दिखाएं।

मोदी-राहुल की राजनीति पर दिखी जिज्ञासा
हिन्दुस्तान के पाठक परवेज मुशर्रफ ने पूछा कि क्या मोदी देश चला पाएंगे? ‘आओ राजनीति करें’ के मंच से जवाब आया कि पहले उन्हें सत्ता में तो आने दीजिए। इसके अलावा एक अन्य पाठक ने पूछा कि क्या यह चुनाव राहुल बनाम मोदी है या राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला है? उन्होंने जवाब दिया कि चुनावों में पार्टी के साथ व्यक्ति की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।

चुप्पी मनमानी का मौका देती है
मनिपाल फिजियोथेरेपी सेंटर के फेसबुक पेज से पूछा गया कि राजनेता सिर्फ वादे करते हैं, उन्हें पूरा नहीं करते? उत्तर था कि जब भी कोई नेता आपके यहां वोट मांगने आए उससे सवाल पूछे। हमारी चुप्पी उन्हें मनमानी का मौका देती है।

खराब राजनीति को हटाना हमारा उद्देश्य होना चाहिए
जातिवाद के खिलाफ हूं

एक पाठक ने पूछा कि जाति आधारित राजनीति कितनी सही है? इससे कब उबर पाएंगे हम? उत्तर था कि मैं जाति आधारित राजनीति का विरोध करता है। इसलिए उपनाम नहीं रखता। पाठक ओमसुधा ने पूछा कि दलितों के लिए अभी तक बदलाव क्यों नहीं हुआ? जवाब आया कि मुझे लगता है कि दलितों, पिछड़ों और वंचित तबकों के लिए जो किया जाना चाहिए था उतना नहीं हुआ। ओम सुधा ने आगे पूछा कि चुनावों से बदलाव क्यों नहीं होता। क्या इससे कभी देश की तस्वीर भी बदलेगी? जवाब था कि ओमसुधा जी, अगर पिछले आठ सालों का चुनावी इतिहास उठा कर देखें तो हर चुनाव ने कुछ न कुछ तो हमेशा बदला ही है। तो क्यूं न हम भले की उम्मीद करें।

खराब राजनीति को बदलिए
शादाब घानी ने पूछा कि क्या हमारा देश वैकल्पिक राजनीति के लिए तैयार है? उत्तर था कि वैकल्पिक राजनीति महज एक नारा है। हमें राजनीति का नहीं, बल्कि खराब राजनीति का विकल्प चाहिए।

बड़ा दल ही बनाता है सरकार
उत्तराखंड से विवेक पूछते हैं कि क्या बहुमत नहीं आने पर भी बड़े दल को सरकार बनानी चाहिए? तो जवाब मिला कि राज्यपाल या राष्ट्रपति मतदान में बड़ा दल बन कर उभरने वाले दल को सत्ता में आने का मौका देते हैं।

सबकी चिंता कौन कुर्सी पर
पाठक शिव ने पूछा कि दिल्ली में इस बार सत्ता पर कौन काबिज होगा? गठबंधन की सरकार या कोई और दल? ऐसे सवाल शिव समेत कई पाठकों ने पूछे। जवाब था कि हम पत्रकार है, नजूमी नहीं। साथ ही कौन सी पार्टी जीतेगी, इसका पैमाना पार्टी चलाने वालों के पास नहीं है।

चर्चा के मुख्य बिंदु
- राजनीति में युवाओं की भागीदारी
- महिला आरक्षण
- गठबंधन की सरकार
- चुनावी रिपोर्टिंग
- लुभावने वादे और भ्रष्टाचार
- क्षेत्रीय दलों की भूमिका
- चुनाव में मुस्लिमों और दलितों की भूमिका
- व्यक्तिगत राजनीति बनाम राजनीतिक दल


अंगुली का इशारा बड़ी भूमिका निभा सकता है
पाठक अमित चौहान ने पूछा कि सत्ता में बेहतरी के लिए क्या होना चाहिए? सिस्टम को कैसे बदला जा सकता है? जवाब था कि लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करती। अब जब चुनाव आपके सामने हैं तो आपकी अंगुली का एक इशारा भी बड़ी भूमिका अदा कर सकता है। सोच-समझ कर वोट दें।

युवाओं को दरकिनार नहीं कर सकते
एक पाठक राहुल कुमार ने शंका जाहिर की कि युवा राजनीति में नहीं आ रहे हैं? उन्होंने कहा कि मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि युवा राजनीति में नहीं आ रहे हैं, अगर राजनीतिक दलों में टिकट मांगने वालों कि सूची उठाइए तो इसमें बड़ी संख्या मे नौजवान हैं और नौजवानों के इस देश में इन्हें दरकिनार भी तो नहीं किया जा सकता। इनकी भूमिका अहम रहेगी इस बार।

मानसिकता बदलनी होगी
उत्तर प्रदेश से डॉ. रचना पंडित ने पूछा कि राजनीति में भागीदारी के बावजूद महिलाएं आज भी न तो सुरक्षित हो सकी हैं और न ही वे आने वाली पीढ़ी में सुरक्षा का भाव जगा पाई हैं। इसकी वजह हमारे राजनेता ही हैं। इसका इलाज कैसे हो, क्या आप बताएंगे। इस पर उनका जवाब था, रचना जी, सिर्फ राजनीति को दोष देन से कुछ नही होगा, जब मौजूदा सिस्टम नहीं था, तब भी तो महिलाओं के साथ अत्याचार होते थे, इसलिए हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी और इसकी शुरुआत हमारे और आपके घरों से ही होगी।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:सोच-समझ कर मारें वोट की चोट