DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

पैसे व चुनाव का गठजोड़ तोड़ना जरूरी

सात अप्रैल से 12 मई, 2014 तक नौ चरणों में होने जा रहे लोकसभा चुनावों के साथ ही चुनाव के खर्च का विवादास्पद मुद्दा एक बार फिर गहरा गया है। कैबिनेट ने चुनाव आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया और खर्च-सीमा को बढ़ाने की मंजूरी दे दी। बड़े व छोटे राज्यों के हरेक लोकसभा क्षेत्र के लिए खर्च-सीमा क्रमश: 70 लाख और 54 लाख रुपये निर्धारित की गई है। कैबिनेट के फैसले के असर पर विचार से पहले हमें यह समझने की जरूरत है कि क्यों चुनाव के खर्चे महत्वपूर्ण हैं? सबसे पहले तो उम्मीदवारों और राजनीतिक पार्टियों को चुनाव लड़ने के लिए वैध तरीके से धन की जरूरत होती है। उम्मीदवारों द्वारा मतदाताओं को यह बताना पड़ता है कि आखिर क्यों वे उन्हें वोट डालें। तब जाकर मतदाता यह फैसला लेते हैं कि किसे वोट डालना है। लोकतंत्र में यह आवश्यक और वैध तरीका है। लेकिन मतदाताओं तक पहुंचने के लिए रैलियों, पोस्टरों, पैम्पलेट्स, होर्डिंग्स, मोबाइल फोन और टेक्स्ट मैसेज का इस्तेमाल किया जाता है और इन प्रचार-अभियानों में काफी पैसे खर्च होते हैं। कार्यकर्ताओं के खर्चों का भुगतान उम्मीदवारों को करना होता है, जैसे उनकी यात्रा, उनके मोबाइल बिल व खाने-पीने के खर्चे। ये सब जायज खर्च हैं और सरकार इसके लिए धन नहीं देती, इसलिए चुनाव आयोग और कैबिनेट ने अपनी समझ के हिसाब से यह तय किया है कि एक उम्मीदवार अधिकतम कितना खर्च कर सकता है।

हालांकि, ‘अवैध’ खर्च भी हैं, जिसके लिए काले धन का इस्तेमाल होता है और मतदाताओं के बीच रकम, तोहफा, शराब, भोजन, कपड़े बांटे जाते हैं और विशाल रैलियों के लिए दर्शकों को भोजन, चाय-पानी और परिवहन के खर्चे दिए जाते हैं। यह सब बांटना पूरी तरह से गैर-कानूनी है। एक जाने-माने राजनेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा था कि उन्होंने लोकसभा चुनाव में आठ करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए। अगर यह सही है, तो यह दो तरह से गैर-कानूनी है। पहला, उन्होंने काला धन खर्च किया और दूसरा, उन्होंने आधिकारिक सीमा से 20 गुना अधिक खर्च किया। अगर कोई चुने जाने के लिए कानून तोड़ता है, तो वह जीतने के बाद क्या करेगा? सरकारी रकम का गलत इस्तेमाल खर्च का एक अन्य ‘गैर-कानूनी’ रूप है। बड़े-बड़े विज्ञापनों, होर्डिंग्स, प्रचार के नाम पर मुफ्त सामान बांटने, उम्मीदवारों के लिए अच्छी बातें लिखने के लिए अखबार को रुपये देने और टीवी-प्रचार पर सैकड़ों करोड़ रुपये फूंक दिए जाते हैं।

सवाल उठता है कि सियासी पार्टियां और उम्मीदवार इतनी बड़ी रकम कहां से जुटाते हैं? कुख्यात राडिया टेप में कुछ प्रसिद्ध उद्योगपति यह दावा करते पकड़े गए कि यह या वह राजनीतिक दल उनकी जेब में है। स्थानीय स्तर पर भी इलाकाई नेताओं के प्रचार अभियान में बड़ी पूंजी खर्च होती है। दरअसल, यह साफ तौर पर शक्ति और प्रभुत्व को खरीदने का प्रयास है। देश के राजस्व पर नियंत्रण ही सत्तारूढ़ पार्टी या सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए बड़ा पुरस्कार है। मौजूदा बजट बताता है कि यह सरकारी राजस्व 11,67,131 करोड़ रुपये है। यानी पांच वर्षों का जोड़ लें, तो यह लगभग 60 लाख करोड़ रुपये हो जाता है। देखा जाए, तो यह यह करीब 50,000 रुपये प्रति व्यक्ति है और 2.4 लाख रुपये प्रति परिवार। जिसका पैसा, उसकी लाठी; जिसकी लाठी, उसका पैसा। लेकिन विडंबना यह है कि यह जनता का पैसा है, जो टैक्स के जरिये वसूला गया।

यदि जनता को कष्ट न उठाना पड़ता, तो यह सब चल जाता। हालांकि, कभी-कभी बड़ी पूंजी और जनता के बीच स्वार्थों का संघर्ष होता है। कुछ लोगों को अधिक लाभ पहुंचाने वाले करार वास्तव में जनता और पर्यावरण, दोनों को काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं। सार्वजनिक संसाधन, जैसे कि पानी, खनिज, कोयला, पेट्रोल, गैस, सड़क, बांध, पार्किंग स्थल व टोल बूथ कई बार बड़ी रियायत में उन अमीर लोगों के हवाले कर दिए जाते हैं, जो चुनाव के लिए फंडिंग करते हैं। कभी-कभी चुनाव के दौरान सांसद अपनी पूंजी का बड़ा हिस्सा खर्च कर देते हैं। यह सब मिलकर भ्रष्टाचार और कुशासन को बढ़ावा देता है। हम खराब सड़क, सार्वजनिक परिवहन, पेयजल, स्कूल, स्वास्थ्य-सेवा, कूड़ा निपटारा, बिजली आदि पाते हैं। इसके लिए किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि जो सत्ता में होते हैं, वे पूंजीपतियों द्वारा प्रभावित किए ही जाते हैं। राजनेता इस पूरे मामले को बखूबी समझते हैं। राजस्थान के एक पूर्व मुख्यमंत्री ने नेशनल इलेक्शन वॉच के कार्यकर्ता को कहा था कि भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए चुनाव में काले धन के इस्तेमाल को रोकने की जरूरत है। चुनाव का काला धन ही भ्रष्टाचार और बुरे शासन का जनक है।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के आंकड़े दर्शाते हैं कि 2009 लोकसभा चुनाव में सांसदों द्वारा औसतन खर्च महज 14.62 लाख रुपये हुए। यह रकम तब की निर्धारित खर्च-सीमा 25 लाख रुपये की 59 फीसदी है। वास्तव में, चुनाव के बाद उम्मीदवारों द्वारा दिए गए खर्च-ब्योरे में यह दिखा कि उन्होंने तय सीमा से काफी कम खर्च किए। ऐसे में, मंत्रिमंडल खर्च-सीमा बढ़ाने के लिए क्यों तत्पर था? क्या यह इस तथ्य की मौन स्वीकृति है कि खर्च के ब्योरे गलत थे? देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा था कि एक सांसद अपने काम की शुरुआत झूठ के साथ करता है, जब वह चुनाव में हुए अपने खर्च का ब्योरा देता है। अब लौटते हैं कैबिनेट के फैसले पर। असल मुद्दा यह है कि काले धन की समस्या, चुनाव में भ्रष्ट आचरण और उम्मीदवारों पर बड़ी पूंजी का नियंत्रण, क्या यह सब खर्च-सीमा बढ़ाने से दूर हो जाएंगे? अगर नहीं, तो हमें क्या करना चाहिए? सबसे पहले तो मतदाताओं को उन उम्मीदवारों को वोट नहीं देना चाहिए, जो चुनाव में काफी पैसे खर्च करते हैं। एडीआर का अभियान ‘मेरा वोट, मेरा देश’ कहता है कि ‘ये घाटे का सौदा है।’ दूसरा, जो उम्मीदवार खर्च-सीमा को पार करके चुनाव जीतते हैं, उन्हें इससे अलग कर देना चाहिए। कैबिनेट और चुनाव आयोग अकेले बेहतर लोकतंत्र नहीं बना सकते। अपने मताधिकार का उचित और तटस्थ इस्तेमाल कर देश की जनता बेहतर लोकतंत्र बना सकती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:पैसे व चुनाव का गठजोड़ तोड़ना जरूरी