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नवजात की मृत्यु सिर्फ सेहत का मामला नहीं

सेव द चिल्ड्रेन ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि देश में 40 प्रतिशत नवजात जन्म के पहले ही दिन दम तोड़ देते हैं। यह रिपोर्ट ‘शाइनिंग इंडिया’ की ‘स्याह’ तस्वीर पेश करती है। अध्ययन बताते हैं कि देश में नवजात शिशु मृत्यु-दर प्रति हजार 33 है, और 29 प्रतिशत नवजात बच्चों की मौत का कारण निमोनिया, सेप्टीसेमिया और गर्भकाल में संक्रमण है। समय पूर्व प्रसव के कारण 24 प्रतिशत और जन्म के तुरंत बाद सांस लेने की अक्षमता से 19 प्रतिशत नवजात की मौत होती है। इन सबका एक अर्थ यह भी है कि अगर समय पर चिकित्सा उपलब्ध हो, तो बाल मृत्यु को तेजी से कम किया जा सकता है, जबकि हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में 7.2 प्रतिशत विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। इसमें 75 प्रतिशत शिशु विशेषज्ञ तथा महिला रोग विशेषज्ञ की छह प्रतिशत कमी बनी हुई है। इसके अलावा, नर्सों व दूसरे चिकित्साकर्मियों की कमी बनी हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, चिकित्सा और जनसंख्या के अनुपात के लिहाज से भारत की स्थिति अफ्रीका महाद्वीप के सहारा क्षेत्र से कोई खास अच्छी नहीं है। इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में दो हजार लोगों पर जहां एक चिकित्सक है, वहीं ऑस्ट्रेलिया में यह अनुपात 247:1 है। बांग्लादेश में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद भारत के मुकाबले आधा है, लेकिन वहां जीवन प्रत्याशा भारत की तुलना में छह साल अधिक है। विश्व में कुल कम वजन के बच्चों में भारत का प्रतिशत 38 है और चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, कम वजन केनवजात शिशुओं की जीवन प्रत्याशा स्वस्थ शिशुओं के मुकाबले 20 प्रतिशत कम होती है।

आंकड़े बताते हैं कि 56.1 प्रतिशत महिलाओं में किसी न किसी तरह की खून की कमी है, जिसका नतीजा गर्भकाल में 20 प्रतिशत से ज्यादा मृत्यु, समय पूर्व शिशुओं के जन्म में तीन गुना वृद्धि तथा नौ गुना अधिक प्रसव-पूर्व मृत्यु के मामलों के रूप में सामने आया है। पिछले कुछ समय में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को नवजात शिशु और मां की मृत्यु के ग्राफ को कम करने पर ध्यान देने के लिए कहा गया है। लेकिन देश में तमाम अन्य योजनाओं की तरह सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं भी भ्रष्टाचार का शिकार हैं। फिर स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए कम बजटीय प्रावधान से भी दिक्कत पैदा हो रही है। ज्यादा प्रावधान से प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों में दवाओं सहित चिकित्सा के साधन बढ़ाए जा सकेंगे। यह भी सच है कि पिछले चार दशक में बाल मृत्यु में कमी आई है, बावजूद इसके भारत अब भी बाल मृत्यु-दर कम करने के लिए निर्धारित लक्ष्य से बहुत पीछे है। इसके लिए जितने प्रयास की जरूरत है, उतने हो नहीं रहे  हैं। इसे लेकर नजरिया बदलने की भी जरूरत है। यह सिर्फ  जन-स्वास्थ्य की एक समस्या भर नहीं है, यह देश को विकास की एक मजबूत नींव देने का मामला भी है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:नवजात की मृत्यु सिर्फ सेहत का मामला नहीं