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मेरी किसानी और रेणु

किसानी करते हुए 365 का आंकड़ा पूरा हुआ। खेत-खलिहानों में अब मन रमने लगा है। एहसास ठीक वैसे ही, जैसे फणीश्वर नाथ रेणु का लिखा पढ़ते हुए और गुलजार का लिखा बुदबुदाते हुए महसूस करता हूं। रेणु का लिखा जब भी पढ़ता हूं, खुद से बातें करने लगता हूं। रेणु के बारे में जब से कुछ ज्यादा जानने-समझने की इच्छा प्रबल हुई, पूर्णिया जिले की फिजा में घुले उनके किस्से इकट्ठा करने में लग गया। घाट-बाट में रेणु को ढूंढ़ने लगा। किसानी करने का जब फैसला लिया, तब भी रेणु ही मन में अंचल का राग सुना रहे थे और मैं उस राग में कब ढल गया, पता भी नहीं चला। ‘गाम’ में रहते हुए रेणु से लगाव और बढ़ गया है। संथाल टोले का बलमा मांझी जब भी कुछ सुनाता है, तो लगता है कि रेणु के रिपोर्ताज पलट रहा हूं।

दरअसल, रेणु की जड़ें दूर तक गांव की जिंदगी में पैठी हुई है। उनका मानना था कि ग्राम समुदायों ने तथाकथित अपनी निरीहता के बावजूद विचित्र शक्तियों का उत्सर्जन किया है। रेणु को पढ़कर ही मैं डायरी और फिल्ड-नोट्स का महत्व समझ पाया। वह छोटे-छोटे ब्योरों से वातावरण गढ़ने की कला जानते थे। मक्का की खेती और आलू उपाजकर जब मैं की-बोर्ड पर टिपियाना शुरू करता हूं, तब एहसास होता है कि फिल्ड नोट्स को इकट्ठा करना कितना बड़ा काम होता है। गाम के मुसहर टोले से जब भी गुजरता हूं, तो लगता है, जैसे रेणु की दुनिया आंखों के सामने आ गई है। सचमुच किसानी करते हुए रेणु के पात्रों से रू-ब-रू हो रहा हूं।
अनुभव में गिरींद्र नाथ झा

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  • Web Title:मेरी किसानी और रेणु