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चुनाव में हिंसा

आम चुनाव की घोषणा के दिन भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच हुई झड़पें इस चुनाव का अंदाज नहीं तय करेंगी, ऐसी उम्मीद करनी चाहिए। देश में चुनावों के अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण होने का दौर काफी कोशिशों के बाद शुरू हुआ है, उसे वापस हिंसा और अराजकता की दिशा में मोड़ना ठीक नहीं। इन हिंसक झड़पों में दोनों पक्ष एक-दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं, लेकिन यह साफ दिखता है कि दोनों की इसमें गलती है। ‘आप’ नेता अरविंद केजरीवाल को गुजरात दौरे में पुलिस द्वारा रोका जाना या उन्हें भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा काले झंडे दिखाना, शायद उचित न हों, लेकिन यह इतना बड़ा मामला भी नहीं था कि दिल्ली और लखनऊ में ‘आप’ कार्यकर्ता भाजपा कार्यालय की ओर कूच कर दें। राजनीति में ऐसी बातें आम हैं, जैसी केजरीवाल के साथ हुईं। उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर बताना या फिर केजरीवाल की हत्या के षड्यंत्र का आरोप लगाना कुछ ज्यादा उग्र प्रतिक्रिया है। इसके बाद भाजपा कार्यकर्ताओं ने जैसी उग्रता का प्रदर्शन किया, वह भी जायज नहीं था। यह सही है कि भाजपा ‘आप’ से बहुत बड़ी पार्टी है और बाहुबलियों की भी उसके पास कमी नहीं है, लेकिन इस बाहुबल का सार्वजनिक प्रदर्शन राजनीति को प्रदूषित करता है। दिल्ली पुलिस की भूमिका भी इस मामले में संदेहास्पद है, क्योंकि उसने ‘आप’ के नेताओं के खिलाफ ही कार्रवाई की है, जबकि हिंसा दोनों ओर से हुई है।

‘आप’ अभी नई पार्टी है और उसके नेताओं को परंपरागत राजनीति से कितनी ही चिढ़ हो, लेकिन उन्हें कुछ नियम-कायदे तो सीख ही लेने चाहिए। तभी उनकी पार्टी राजनीति में दूर तक जा पाएगी और जिन परिवर्तनों का दावा वह कर रही है, उन्हें सचमुच कर पाएगी। हर मुद्दे पर सड़क पर निकल आना अच्छी शैली नहीं है और आंदोलनों के लिए जरूरी है कि ‘आप’ के कार्यकर्ता अनुशासनबद्ध हों। अगर ‘आप’ सड़कों पर टकराव की राजनीति बार-बार करेगी, तो उसे ही नुकसान होगा, क्योंकि बाकी पार्टियां उससे कहीं ज्यादा बड़ी और शक्ति-संपन्न हैं। अरविंद केजरीवाल के लिए यदि गुजरात में कुछ अड़चनें खड़ी की जा रही थीं, तो उस मुद्दे पर विरोध प्रकट करने या उसका राजनीतिक फायदा उठाने के दूसरे तरीके हो सकते हैं। चुनावी माहौल में दूसरी पार्टी के केंद्रीय कार्यालय पर धावा बोल देना चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन तो है ही, अनावश्यक आक्रामकता भी है।

ऐसी आक्रामकता चुनावी माहौल को उग्र और हिंसक बनाएगी, जो लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। ‘आप’ की यही आक्रामकता उसके मित्रों की तादाद घटाएगी और शत्रुओं की बढ़ाएगी। अपनी आक्रामकता से पार्टी ने जनता की हमदर्दी हासिल करने का मौका तो खो ही दिया। भाजपा को इस चुनाव में सत्ता अपने हाथ के बिल्कुल पास दिख रही है और इसलिए उसके कार्यकर्ताओं में अतिरिक्त उत्साह है, जो असहिष्णुता और उग्रता की हद तक पहुंच जाता है। साफ है, अपनी सत्ता के रास्ते में उसे ‘आप’ एक बाधा लग रही है, इसलिए वह ‘आप’ के प्रति कुछ ज्यादा ही आक्रामक है। ‘आप’ के प्रदर्शनों पर भाजपा की प्रतिक्रिया भी निहायत असंयत थी। हिंसा तात्कालिक रूप से विजय का एहसास तो कराती है, पर आखिरकार वह नुकसानदेह साबित होती है। ‘आप’ के नेताओं ने हिंसा पर खेद तो व्यक्त किया है, लेकिन भाजपा के किसी नेता ने खेद व्यक्त करने की भी जरूरत महसूस नहीं की। यह अहंकार और गैर-जिम्मेदारी देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी को शोभा नहीं देती। लोकतंत्र की मर्यादाओं की रक्षा करने की जिम्मेदारी सबकी है और इसमें बच्चों की तरह ‘पहले उसने मारा’ जैसे आरोप नहीं चल सकते।

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