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पाला बदलते नेता

हर चुनाव के वक्त ऐसा होता है कि काफी सारे लोग पुरानी पार्टी छोड़कर धुर विरोधी दल के साथ हो जाते हैं। इसे विशुद्ध अवसरवादिता ही समझों, हालांकि जताया यही जाता है कि सब कुछ सिद्धांत के लिए किया जा रहा है। अगर कोई ईमानदारी से अपने दल या अपनी सरकार की नीतियों के खिलाफ है, तो उसे पांच साल तक सांसदी या विधायकी का सुख क्यों भोगना चाहिए था? जनता को ऐसे नेताओं से बचकर रहना चाहिए। इनके लिए किसी नीति या विचारधारा का कोई मतलब नहीं है। ऐसे लोग सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने के लिए जीत की संभावना वाले खेमे तलाशते रहते हैं। जनता को उन प्रत्याशियों को अधिक महत्व देना चाहिए, जो सामने पराजय देखकर भी अपनी पार्टी और उसकी नीतियों के साथ पूरी प्रतिबद्धता के साथ खड़ा रहा। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए हमें सत्ता-लोभी लोगों से परहेज बरतना चाहिए।
देविका शर्मा, किशन कुंज, दिल्ली-92

जेबकतरों का आतंक

कॉमनवेल्थ गेम्स में भ्रष्टाचार की बातें चाहे जितनी भी हों, मगर दिल्ली की सड़कों पर दौड़ने वाली डीटीसी बसों का हुलिया ही बदल गया। दिल्ली के लोगों को न सिर्फ नई बसें मिलीं, बल्कि सफर भी कुछ आसान हुआ। कम से कम पुरानी खटारा बसों से तो छुटकारा मिल ही गया, जो मंजिल से पहले ही मुसाफिरों को बीच में ही उतार खड़ी हो जाती थीं। लेकिन एक मुसीबत अब भी बनी हुई है। डीटीसी की बसों में जेबकतरों का आतंक कम नहीं हुआ। ये अक्सर दो-तीन के गिरोह में होते हैं और मुसाफिरों के मोबाइल, पर्स पर हाथ साफ करके चंपत हो जाते हैं। कई बार तो यदि किसी ने साहस दिखाकर किसी जेबतराश को पकड़ भी लिया, तो उसके दूसरे साथी चाकू निकाल लेते हैं, जिससे डरकर कोई नहीं बोलता और वे सरेआम बस से कूद भागते हैं। दिल्ली पुलिस को सादे कपड़ों में अभियान चलाना चाहिए, ताकि इन गिरोहों का खात्मा हो सके।
मोहन मलिक, न्यू अशोक नगर, दिल्ली-96

सामाजिक चेतना जरूरी

पिछले दिनों प्रकाशित अंजलि सिन्हा का ‘आत्मरक्षा नहीं, सुरक्षा के उपाय जरूरी’ शीर्षक आलेख पढ़ा। लेखिका ने ठीक लिखा है कि आत्मरक्षा के लिए विभिन्न तरह के उपाय करना, जैसे स्प्रे रखना, कराटे सीखना आदि अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन महिलाओं की रक्षा के लिए ये पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि अपराधियों के पास इनका तोड़ है। इसके लिए जनजागृति, समाज में चेतना और आत्मानुशासन जरूरी हैं। जब तक समाज नहीं चेतेगा, तब तक कुछ भी नहीं होने वाला।
मधुलिका दिनेश कुमार, गुरुतेग बहादुर नगर, दिल्ली-09

सोशल मीडिया को बख्श दें

इन दिनों फेसबुक पर सबसे गरमागरम राजनीतिक विमर्श देखने को मिल रहा है। कोई खबर ब्रेक हुई नहीं कि टिप्पणीकार अवतरित हो जाते हैं। यह सही है कि लोगों की राजनीतिक चेतना के विकास में सोशल मीडिया अहम भूमिका निभा रहा है, लेकिन क्या विमर्श के नाम पर कुछ भी बकवास उचित है? यह जानते हुए कि दोस्तों की सूची में सभी वैचारिक पृष्ठभूमि के लोग हैं, लोग आहत करने वाली भाषा का इस्तेमाल करते हैं। यह कहीं से भी उचित नहीं है। सोशल मीडिया का इस्तेमाल पूरी जिम्मेदारी से होना चाहिए।
अरुण सिंह, साउथ कैंपस, दिल्ली विश्वविद्यालय

राजनीति में अफसर

पिछले कुछ दिनों में कई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों व फौजी अफसरों ने विभिन्न राजनीतिक दलों की सदस्यता ग्रहण की। तो क्या जब वे निर्णय करने की हैसियत में थे, तब उनके फैसले भी उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से प्रेरित थे या फिर ये लोग हमेशा सत्ता में बने रहना चाहते हैं? जो भी हो, उनके राजनीति में आने से उनकी ही साख को बट्टा लगा है। भविष्य में ऐसा न हो, इसके लिए सरकार को कदम उठाना चाहिए।
आलोक यादव
advocatealokyadav@gmail.com

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