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दोस्ती में खटास

आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अभियान शुरू करने पर अमेरिका ने पाकिस्तान को सैनिक हथियार दिए और आर्थिक सहायता का विशाल पैकेा भी। उसका मकसद कभी पूरा नहीं हुआ। अफगानिस्तान में आतंकवाद का खात्मा तो दूर की बात है, हामिद कराई सरकार की पकड़ सिर्फ राजधानी काबुल तक सीमित है। इस बीच अफगानिस्तान की सीमा से सटे पाक प्रांतों में तालिबानी तत्वों ने शरण पाकर वहां मजहबी कट्टरपंथ की जड़ें काफी मजबूत कर ली हैं। यह स्थिति अफगानिस्तान में तैनात नाटो सेनाओं और स्वयं पाकिस्तान के लिए जटिल समस्याओं का कारण बन गई है। विगत में तालिबानी तत्वों को पालने-पोसने वाली पाक सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ जंग में कभी मन से सहयोग नहीं दिया। उसकी सेना व खुफिया संगठन आईएसआई गुपचुप तरीके से इन लड़ाकों को शरण-सुरक्षा प्रदान करते रहे हैं। यह स्थिति आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय जंग में पाक को सहयोगी बनाने की नाकामी दर्शाती है। अमेरिकी वायुसेना के हमले में 11 पाक सैनिकों के मार जाने की घटना का विश्लेषण इसी संदर्भ में किया जाना चाहिए। आतंकवाद के खात्मे के उद्देश्य से मिली अमेरिकी शस्त्रास्त्र व आर्थिक सहायता का इस्तेमाल उसने भारत के खिलाफ अपनी रक्षा क्षमता की मजबूती के लिए किया। आतंकी संगठनों के साथ उसकी साठगांठ भी जारी रही। इस पर अमेरिका ने पहले अपनी आंखें फेर ली थीं, बाद में जब एहसास हुआ तो बहुत देर हो चुकी थी। पाक सैनिकों के मार जाने पर गिलानी सरकार ने अमेरिका से विरोध जताया है। दोनों देशों ने संयुक्त जांच का फैसला किया है। लेकिन, नाटो सेनाओं ने इस घटना से संबंधित जो वीडियो पाक सरकार को दिखाया है, उससे यही साबित होता है कि पाक सैनिक गोलीबारी कर आतंकवादियों को सुरक्षा प्रदान कर रहे थे। इसके कारण ही अमेरिकी वायुसेना हमले के लिए बाध्य हुई। हकीकत चाहे जो हो, दोनों देशों के रिश्तों में फिलहाल खटास आई है। मुमकिन है कि उनकी सरकारं लीपापोती की कोशिश करं। पर, क्या ऐसे लचर रवैये से आतंकवाद मिटेगा?

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  • Web Title: दोस्ती में खटास