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गठबंधनों में टूट, राजनीतिक समीकरण में बदलाव तय

बिहार में लोकसभा चुनाव को लेकर सभी पार्टियों ने करीब-करीब अपने राजनीतिक साथियों की तलाश कर ली है और चुनावी समर में गठबंधन का खम ठोंकना शुरू कर दिया है।

इधर, नए गठबंधनों को देखते हुए चुनावी व्यूह रचना करने वाली पार्टियों में राजनीतिक समीकरणों का बदलना तय माना जा रहा है।

पिछले चुनाव में बिहार की सतारूढ़ पार्टी जनता दल (युनाइटेड), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ चुनावी अखाडेम् में उतरी थी, जबकि इस बार के लोकसभा चुनाव में जद (यू) का भाजपा से अलग होकर भारतीय कम्यूनिस्टा पार्टी (भाकपा) के साथ चुनावी मैदान में उतरना तय माना जा रहा है।

इधर, भाजपा ने भी अपने नए साथी के रूप में लोकजनशक्ति पार्टी (लोजपा) और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) को चुना है। बिहार की राजनीति में अलग पहचान रखने वाले लालू प्रसाद की राष्ट्रीय जनता दल (राजद) इस बार चुनाव में लोजपा से अलग कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकंपा) के साथ चुनाव मैदान में उतर रही है।

ऐसे में पुराने गठबंधन के टूट को देखते हुए आगामी चुनाव में राजनीतिक समीकरण में बड़ा उल्टफेर होना तय माना जा रहा है।

राजनीति के जानकार कहते हैं कि लालू की मंशा कथित धर्मनिरपेक्ष दलों के मतों के बिखराव को रोकने की रही है। ऐसे में जद (यू) का भाजपा से अलग होकर अल्पसंख्यक मतों को अपनी ओर आकर्षित करने की मंशा राजद-कांग्रेस गठबंधन के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। राजद और कांग्रेस का गठबंधन राज्य में अल्पसंख्यक मतदाताओं की पहली पसंद मानी जाती रही है।

आंकड़ों पर गौर करें, तो राज्य में मुस्लिम आबादी 17 प्रतिशत है और यहां 13 लोकसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां मुसलमानों की आबादी 18 से 44 प्रतिशत के बीच है। किशनगंज लोकसभा क्षेत्र में 69 प्रतिशत के करीब मुस्लिम मतदाता हैं। जानकार बताते हैं कि अल्पसंख्यक मतों का ध्रुवीकरण अगामी लोकसभा चुनाव में हो पाने की संभावना नजर नहीं आ रही। माना जा रहा है कि अल्पसंख्यक मतदाता उसी गठबंधन को मत देंगे जो भाजपा उम्मीदवार को हराने में सक्षम हो।

यही स्थिति पिछड़ी जातियों को लेकर है। भाजपा पिछड़ी जातियों के मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए रामविलास पासवान की लोजपा के साथ गठबंधन कर चुकी है। बिहार में पिछड़े मतदाताओं की संख्या 50 प्रतिशत से ज्यादा है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा यादवों का लगभग 11 प्रतिशत है जबकि कुर्मी और कोइरी सात प्रतिशत के करीब है।

माना जाता है कि यादव मतदाता लालू के पक्के वोट बैंक हैं। इधर, नीतीश कोइरी-कुर्मी वोटों के सहारे सत्ता में आए जरूर परंतु सता में आने के बाद उन्होंने अति पिछड़ों का कार्ड खेला। इन 50 प्रतिशत पिछडे़ मतदताओं में अति पिछड़े 30 से 32 प्रतिशत हैं जबकि शेष 20 प्रतिशत पिछड़ों में यादव, कुर्मी, कोइरी करीब 18 प्रतिशत हैं।

पिछले लोकसभा चुनाव में जद (यू)-भाजपा गठबंधन को राज्य के कुल 40 लोकसभा सीट में 32 पर अपना कब्जा जमाया था।

इधर, वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार सिंह कहते हैं कि इस चुनाव में पूर्वानुमान लगाना कठिन होगा क्योंकि जद (यू)-भाजपा गठंबधन ने पिछले कई वर्षों में मतदाताओं में एक अलग पहचान बनाई थी जो इस बार टूट चुका है, ठीक वहीं हाल लोजपा का भी है।

वे कहते हैं, ''इस बार चुनावी समीकरण गड़बड़ाना तय है परंतु इस चुनाव में ऐसे मतदाता निर्णायक होंगे जो हवा का रुख देखकर मतदान करते हैं।''

वैसे तो सभी गठबंधन एक दूसरे दलों के मतों में सेंध लगाने की कोशिश करेंगे ही साथ ही वोट बैंक के बिखराव के बाद उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करेंगे।

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