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चुनाव का फल

यह चुनाव का फल भी अजीब शै है। एक के लिए मीठी तो दूसर के लिए कड़वी। एक दल मगन है, दूसर में कुढ़न है। वह शव परीक्षण में लगे हैं। क्या हो गया? इतने वादे दल ने किए, दौर बचुवा ने। गाँव-गाँव की खाक छानी। खानदान का हवाला दिया। पुरखों के गुण गाए। अल्पसंख्यकों को कभी सच्चर राग सुनाया तो कभी साम्प्रदायिक ताकतों का डर दिखाया। कुछ भी काम न आया! ज्योतिषियों ने जीत का भरोसा दिलाया, तब भी हार गए। कहीं ऐसा तो नहीं कि खानदान के पानदान की चमक फीकी है! कहीं कीमतों का विषधर डँस तो नहीं गया वोट को। आपसी अनबन के जहर से निष्क्रिय तो नहीं हो गया संगठन! कई बड़े सवाल, जवाब ढूँढ रहे हैं परशान हाई-कमान से। सियासी संगी-साथी और दोस्त सब की चारित्रिक सिफत है मतलब परस्ती। कल तक दुम हिलाते थे। आँखें तरर रहे हैं अब। नेता होना इधर बड़ी हिम्मत का काम है। नेता शब्द सुनते ही लोग नाक-भौं सिकोड़ते हैं। कुछ पान के शौकीन पीक करते हैं, बाकी गाली-गलौज। माँ-बाप भी बचपन से ही बच्चों को सिखाते-समझाते हैं- ‘ौया! चोरी-चकारी कर लेना, नेतागीरी मत करना। बड़ा बदनाम धंधा है।’ड्ढr यह तो साहसी भी नहीं है। बड़ी कबूतरी प्रवृत्ति के हैं इस दल के लीडर। अच्छे वक्त में चोंच से चोंच मिलाकर साथ-साथ गुटरगूँ की। महंगाई जसी मुश्किलात की बिल्ली दिखी तो आँखें मूँद लीं। बाहर से समर्थन के यही तो फायदे हैं। आम का आम, गुठली का दाम इसी को कहते हैं। सत्ता की सारी सुविधा अपनी और सरकार के सार झंझट उनके। मंच पर कठपुतली इठलाती है, जबकि उसकी डोर पर नियंत्रण रहता है किसी और का। पत्थर पड़े तो कठपुतली के, और तारीफ हो तो सूत्रधार की कि क्या कमान साध रखी है सरकार की। जब इशारा हो तो कदम-ताल करती है और जब ‘थम’ का हुक्म हो तो ‘थैया थैया’, वह भी एक जगह खड़े हो कर। न्यूक्िलयर डील के मसले में यह नहीं तो और क्या हो रहा है।ड्ढr ‘रिमोट’ का जमाना है। घर-घर में टीवी है। रिमोट है। कोई सीरियल, कोई क्रिकेट, कोई न्यूा देखना चाहता है। विवाद है। गृह-शांति को खतरा है। झगड़ा टंटा है। सियासी अफवाह है कि इस दल का रिमोट देश के बाहर है। उसी के चलते कभी चोंच मिलाता है यह तो कभी आँख दिखाता है, कभी रूठ कर दूसरी डाल पर जाने की धमकी दे डालता है। इसीलिए ज्ञानी कहते हैं कि रिमोट जो न करवाए कम है। हारा हुआ दल भी सोचता है-ड्ढr न होती हार,ड्ढr न होता रिमोट का, अनपेक्षित वार,ड्ढr ऐसी तकरार!ड्ढr

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