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गठबंधन में सीटों के बंटवारे के हीरो रहे लालू

पटना। विनोद बंधु। लंबी मशक्कत और खींचतान के बाद बुधवार को लोकसभा चुनाव कार्यक्रमों की घोषणा के साथ ही बिहार में राजद, कांग्रेस और एनसीपी के बीच गठबंधन ने आकार ले लिया। यह यूपीए वन से थोड़ा जुदा है, क्योंकि इसमें लोजपा शामिल नहीं है। अपेक्षित सीटें मिलने की नाउम्मीदी में लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान ने भाजपा से दोस्ती गांठ ली। हालांकि सीटों के बंटवारे में कांग्रेस की भी बहुत नहीं चली।

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद अपने अनुकूल सीटों का बंटवारा कराने में कामयाब रहे। कांग्रेस को अपने पुराने गढों के दावे भी छोड़ने पड़े। पासवान के एनडीए में जाने के बाद कांग्रेस के सामने दो ही विकल्प थे या तो वह जदयू के साथ जाए या राजद के साथ।

जदयू से उसे गठबंधन के लिए सकारात्मक संकेत नहीं मिले। राजद से गठबंधन के कारण बिहार में कांग्रेस को एक मजबूत साथी तो मिल गया है, लेकिन उसे दक्षिण, पश्चिम और पूर्वी बिहार में अपने पांव समेटने पड़े हैं।

साथ ही वह बिहार कांग्रेस के अपने तमाम बड़े नेताओं के लिए भी सीटें हासिल करने में नाकाम रही। सीटों की अपनी कसौटी यानी बीते चुनाव में एक लाख से अधिक वोट लाने वालों को फिर से टिकट देने के फैसले से भी उसे पीछे हटना पड़ा है। इस तरह गठबंधन में सीटों के बंटवारे के हीरो लालू प्रसाद ही रहे। कांग्रेस को उनकी शर्ते माननी पड़ी। कांग्रेस को अपने पुराने गढ़ में भी चुनाव लड़ने के लिए सीटें नहीं मिल पाई है।

राजद से गठबंधन में उसे 2004 में मधुबनी सीट मिली थी। यहां से कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचवि डा. शकील अहमद चुनाव लड़ते रहे हैं। लेकिन इस बार यह सीट भी उसे नहीं मिली। माना जा रहा हे कि राजद विधायक दल के नेता अब्दुल बारी सिद्दिकी यहां से गठबंधन के उम्मीदवार होंगे।

कांग्रेस को दरभंगा प्रमंडल में एक समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर प्रमंडल में दो मुजफ्फरपुर और वाल्मीकिनगर, पूर्णिया प्रमंडल में दो किशनगंज और पूर्णिया, सहरसा प्रमंडल में एक सुपौल सीट तो मिली है लेकिन सारण, भागलपुर और मुंगेर प्रमंडल में एक भी सीट नहीं मिली है।

बहरहाल, राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद की महागठबंधन बनाने की हसरत भले ही पूरी नहीं हो पाई, लेकिन कांग्रेस और एनसीपी से फिर से चुनावी दोस्ती गांठने में वह कामयाब रहे। कांग्रेस लंबे समय से बिहार में फिर से अपना पांव जमाने का सपना बुन रही है, लेकिन उसे इसमें कामयाबी नहीं मिल पा रही है। इस बार भी गठबंधन में जाने की उसकी मजबूरी का यही मूल कारण है। गठबंधन से तीनों दलों को लाभ मिलने की उम्मीदें हैं।

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