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चुनाव का बिगुल

लोकसभा चुनावों के कार्यक्रम की घोषणा होने के साथ ही दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र में चुनावों की रणभेरी बज गई। भारत में लगभग 81 करोड़ मतदाता हैं और इसीलिए आम चुनावों का इंतजाम एक मुश्किल और जटिल प्रक्रिया है। भारत के कई हिस्से दुर्गम हैं और बहुत बड़े हिस्सों में माओवादी हिंसा का खतरा है। इसके बावजूद यह लग सकता है कि चुनाव का कार्यक्रम कुछ ज्यादा खिंच गया है।

चुनाव नौ चरणों में सात अप्रैल से 12 मई तक होंगे और नतीजे 16 मई को सामने आएंगे। इसका अर्थ यह है कि अगले लगभग ढाई महीने तक चुनावी हलचल चलेगी। इन ढाई महीनों में आदर्श आचार संहिता लागू रहेगी और सरकारें कोई बड़ा या नीतिगत फैसला नहीं कर पाएंगी। प्रशासन सिर्फ नियमित कामकाज ही निपटाता रहेगा। हालांकि देखा जाए, तो इन चुनावों में छह चरणों में ही काफी सीटों पर चुनाव होंगे। सात अप्रैल के पहले चरण में दो राज्यों की छह सीटों पर, नौ अप्रैल के दूसरे चरण में पांच राज्यों की सात सीटों पर और 12 अप्रैल को तीन राज्यों की पांच सीटों पर चुनाव होंगे, यानी इन तीन चरणों में कुल 543 में से 18 सीटों पर चुनाव होंगे।

यह सही है कि ये सारी सीटें पूर्वोत्तर राज्यों में हैं, जहां एक-एक सीट पर चुनाव कराना मशक्कत भरा काम है और एक-एक मतदान केंद्र पर पहुंचने में कई दिन लग जाते हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में वोटरों और चुनाव अधिकारियों की सुरक्षा भी एक बड़ी समस्या होती है, क्योंकि कई इलाकों में अलगाववादी संगठन सक्रिय हैं। इसके बावजूद चुनाव कार्यक्रम कुछ छोटा किया जाना मुमकिन था।

चुनाव कार्यक्रमों में इस बार एक दिक्कत यह भी है कि यह परीक्षा का मौसम होता है। छात्र और शिक्षकों को इस दौरान दिक्कत न हो, यह देखना भी जरूरी था। शिक्षकों की तैनाती चुनावों में की जाती है और अक्सर स्कूल-कॉलेजों में मतदान केंद्र भी बनाए जाते हैं। चुनाव आयोग को इसे भी मद्देनजर रखना था। यह अच्छा है कि आयोग ने शुरुआती चरणों में माओवादी हिंसा से प्रभावित इलाकों में चुनाव का कार्यक्रम बनाया है। इससे बड़ा फायदा यह होगा कि जिन सुरक्षा बलों को चुनाव कार्यक्रम में लगाया जाना है, वे तब ताजादम होंगे।

माओवादी प्रभाव वाले इलाकों में चुनाव कराना कठिन काम है, हालांकि उन इलाकों की जनता चुनावों में उत्साह से हिस्सेदारी करती है। चुनाव कराने वाले सरकारी कर्मचारियों और मतदाताओं की सुरक्षा के लिए इन इलाकों में व्यापक सुरक्षा इंतजाम करने पड़ते हैं, इसलिए शुरुआती चरणों में ही यहां चुनाव करवाना एक अच्छा फैसला है।

अगर माओवादी या अलगाववादी हिंसा से प्रभावित इलाकों को छोड़ दिया जाए, तो बाकी भारत में चुनावी हिंसा लगभग खत्म हो गई है। इसका सबसे बड़ा श्रेय चुनाव आयोग को ही जाता है, जिसकी सख्ती ने चुनावों को शांतिपूर्ण बनाया। इसके अलावा समाज में बढ़ती राजनीतिक समझ और मीडिया की मौजूदगी की वजह से भी वे वर्ग और समूह भी अब वोट डालने बाहर निकलते हैं, जो कुछ दशक पहले तक अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाते थे। चुनावों के शांतिपूर्ण होने की वजह से मतदान का प्रतिशत भी बढ़ा है।

इसलिए अगर चुनाव आयोग चाहता, तो चुनावों का कार्यक्रम छोटा कर सकता था, इससे प्रशासनिक समस्याएं भी कम होतीं और चुनाव में खर्च भी उतना नहीं होता। पिछले कुछ वक्त से आयोग ज्यादा सावधानी बरत रहा है कि चुनावी प्रक्रिया पर दाग न लगे। यह आपत्ति अपनी जगह है, पर भारतीय लोकतंत्र के अगले उत्सव की तारीख घोषित हो गई है। अगले कुछ महीने इसी उत्साह में बीतेंगे।

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