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स्वार्थी नहीं है मध्य वर्ग

भारतीय चुनावों के नतीजों की भविष्यवाणी करना हमेशा ही मुश्किल भरा होता है। 2004 में परंपरागत समझ यही कह रही थी कि भाजपा सत्ता में वापस आ जाएगी। मैंने इसे हमेशा की तरह गलत समझा और लिखा, ‘लगता है अटल बिहारी वाजपेयी को नहीं हराया जा सकता।’ ओपीनियन पोल भाजपा की इतनी बड़ी जीत दिखा रहे थे कि सरकार ने इस लहर (इंडिया शाइनिंग) का फायदा उठाने के लिए चुनाव तय समय से काफी पहले करवा लिए। और नतीजा यह हुआ कि भाजपा हार गई, सभी चुनाव विशेषज्ञों और पंडितों की भविष्वाणी को धता बताते हुए कांग्रेस सत्ता में आ गई।

इसलिए इस चुनाव में मैं भविष्यवाणियां करने का जोखिम नहीं उठाऊंगा। एक बार फिर चुनावी पंडित यही कह रहे हैं कि अगर कांग्रेस इस बार बहुत भाग्यशाली रही, तभी उसे 100 से ज्यादा सीटें मिल सकेंगी और यह भी कहा जा रहा है कि इस बार भाजपा को कोई हरा नहीं सकता। लेकिन ऐसे विशेषज्ञ और टीकाकार पहले भी गलत साबित हो चुके हैं।

इन सारी बातों के बावजूद एक चीज साफ तौर पर दिखाई देती है कि कांग्रेस ने पढ़े-लिखे मध्य वर्ग का विश्वास खो दिया है। हर जनमत संग्रह यही बताता है, और वे सभी गलत नहीं हो सकते। इसके अलावा हमें अपने दोस्तों और पड़ोसियों से बातचीत में भी यही सुनने को मिलता है। हालांकि इस तरह के सबूत हमेशा विश्वसनीय नहीं होते, लेकिन ऐसी चीजें जब हर तरफ सुनाई दें, तो उन्हें गंभीरता से लेना ही चाहिए। और सच यही है कि पढ़े-लिखे मध्य वर्ग ने कांग्रेस से उम्मीद छोड़ दी है।

यूपीए-2 से वह निराश है और उसे यह सोचने का कोई कारण नहीं दिखाई देता कि हालात भविष्य में बेहतर हो सकते हैं। यहां तक कि कांग्रेस को भी, देर से ही सही, यह एहसास हो चला है कि मध्य वर्ग उसके खिलाफ है। पर कई कांग्रेसियों ने इसके भी तर्क ढूंढ़ लिए हैं। वे कहते हैं कि मध्य वर्ग स्वार्थी होता है। वह गरीबों के हालात सुधारने के किसी भी कदम का विरोध करता है। और वह बहुत ज्यादा धर्मनिरपेक्ष भी नहीं है, इसलिए नरेंद्र मोदी मध्य वर्ग के हीरो बन गए हैं।

इस तरह के तर्को का कोई अर्थ नहीं है। सबसे पहली बात तो यह है कि मध्य वर्ग स्वार्थी नहीं है। जब यूपीए-1 सत्ता में थी, तब आधुनिक भारत के इतिहास में पहली बार गरीबों के लिए इतने ज्यादा प्रावधान किए गए थे। लाखों किसानों के कर्ज माफ कर दिए गए थे। गांवों के गरीब जीवन-यापन कर सकें, इसके लिए नरेगा योजना लागू की गई थी। ईंधन, डीजल, रसोई गैस, केरोसीन वगैरह पर सब्सिडी बढ़ाई गई थी, ताकि गरीबों को विश्व बाजार में हुई मूल्य वृद्धि से बचाया जा सके। इन सब कदमों का उदारवादी अर्थशास्त्रियों ने विरोध किया था। यहां तक कि मनमोहन सिंह भी सब्सिडी घटाने और किसानों की कर्ज माफी के बुरी तरह खिलाफ थे। लेकिन मध्य वर्ग ने इसका विरोध नहीं किया। कहीं न कहीं उसके अंदर यह भाव था कि पिछले दशक में जो समृद्धि आई है, उसका फायदा गरीबों तक पहुंचना चाहिए।

अगर मध्य वर्ग गरीबों के प्रति सरकार की इस उदारता का विरोधी होता, तो शायद यूपीए 2009 में दोबारा सत्ता में नहीं लौटती, वह भी पहले के मुकाबले ज्यादा सीटों के साथ। उस चुनाव में इसे शहरी निर्वाचन क्षेत्रों में पहले से ज्यादा वोट मिले थे। इसलिए मध्य वर्ग और चाहे जैसा हो, लेकिन स्वार्थी नहीं है। तो फिर यह पढ़ा-लिखा मध्य वर्ग यूपीए-2 की कल्याणकारी योजनाओं से क्यों आजिज आ चुका है? इसका जवाब बहुत आसान है। अगर आप संपत्ति का वितरण करना चाहते हैं, तो सबसे पहली जरूरत यह है कि आप संपत्ति का निर्माण करें। यूपीए-2 ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गर्त तक पहुंचा दिया, निवेश को दूर कर दिया, फैसले करने से इनकार कर दिया और नतीजा यह हुआ कि दुनिया ने भारत पर ध्यान देना ही बंद कर दिया।

समृद्धि के दौर में जो चीज आर्थिक न्याय लग रही थी, कठिन समय आते ही वह ऐसी फिजूलखर्ची की तरह दिखने लगी, जिसका अकेला मकसद सिर्फ वोट हासिल करना ही हो। जहां तक धर्मनिरपेक्षता के तर्क की बात है, सच यह है कि कांग्रेस का हिसाब इस पर गलत रहा। नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी खामी 2002 के दंगे नहीं थे। सबसे बड़ी खामी यह थी कि दंगों के बाद भी वह अपने भाषणों और कामों में हिंदू समर्थक तेवर अपनाते रहे। उन्होंने मुसलमानों को आश्वस्त करने के लिए कुछ नहीं किया।

कई दूसरे टीकाकारों की तरह ही कांग्रेस भी यही सोच रही थी कि नरेंद्र मोदी का 2014 का चुनाव अभियान उनके पुराने तेवर पर ही चलेगा। इस बार भी वह हिंदू भावनाओं को भड़काने के लिए हिंदू लहर पैदा करने की कोशिश करेंगे। अगर वह ऐसा करेंगे, तो मध्य वर्ग उनसे दूर हो जाएगा और मुस्लिम मतदाता कांग्रेस के पीछे एकजुट हो जाएंगे। लेकिन वास्तव में मोदी ने इस बार हिंदू कार्ड खेलने से इनकार कर दिया। उनका अभियान इस बार हिंदुत्व पर आधारित नहीं है। इसकी बजाय वह यूपीए-2 की नाकामियों और खराब रिकॉर्ड को निशाना बना रहे हैं। वह उसे ऐसी सरकार बताते हैं, जो निर्णायक नहीं है और जिसके पास कोई नेतृत्व नहीं है। पढ़े-लिखे लोग अब भी मोदी की सांप्रदायिकता को लेकर असहज हैं, फिर भी वे उनका समर्थन करते हैं, क्योंकि उनके सामने और कोई विकल्प नहीं है।

अरविंद केजरीवाल मध्य वर्ग के लिए एक विकल्प हो सकते थे, लेकिन केजरीवाल ने इस वर्ग का दामन छोड़ दिया। अब नतीजा यह है कि अगला आम चुनाव हिंदू-मुस्लिम के मुद्दे पर नहीं लड़ा जा रहा, वह यूपीए-2 के खराब कामकाज के मसले पर लड़ा जा रहा है। और जब दंगों की बात चलती है, तो 1984 के सिख नरसंहार का मसला उठ जाता है, जिसमें खुद कांग्रेस फंस जाती है।

पीछे मुड़कर देखें, तो ऐसा लगता है कि कांग्रेस खुद मध्य वर्ग को खोना चाहती थी। यह कई चीजों से लगता है- मनमोहन सिंह का अदृश्य शासन, एक साल पहले तक यह पता न होना कि पार्टी में अंदरूनी लोकतंत्र के अलावा राहुल गांधी के विचार क्या हैं, और उन गैर-आर्थिक सुधारों से सरकार का कन्नी काटना, जो पढ़े-लिखे भारतीयों की जिंदगी आसान बना सकते थे। अगर सरकार कई महीने वॉलमार्ट पर बरबाद करने की बजाय लोगों को जल्द न्याय दिलाने के लिए न्यायिक तंत्र में सुधार करती और पुलिस सुधार लागू करती, तो कोई इसका विरोध भी न करता। और तो और पार्टी ने कंप्यूटर क्रांति से भी मुंह फेर लिया। नतीजा यह हुआ कि फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर भाजपा को चुनौती देने वाला कोई था ही नहीं।

मैं अब भी चुनाव को लेकर कोई भविष्यवाणी नहीं करना चाहता। इस मामले में मेरे खराब रिकॉर्ड को देखते हुए यही बुद्धिमानी है। लेकिन मैं एक भविष्यवाणी जरूर करूंगा कि मध्य वर्ग का विश्वास हासिल करने में कांग्रेस को अब कम से कम पांच साल का समय तो लगेगा ही।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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