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कहीं दीप जले-कहीं दिल, सरकार की यही मंजिल

कई लोग यह मानते हैं कि हिंदी सिनेमा ज्ञान का विश्वसनीय भंडार है। वे के आसिफ को सबसे बडम इतिहासकार और आमिर खान को देश का सबसे बड़ा समाजशास्त्री मानते हैं। वे शायद यह भी सोचते होंगे कि भूत सिर्फ महिलाओं के ही होते हैं। सफेद नाइटी उनकी यूनिफॉर्म है और उनकी गाने में ट्रेनिंग होती है। रामगोपाल वर्मा ने भूतों के समाजशास्त्र में परिवर्तन करने की कोशिश की, लेकिन उनकी फिल्में बिना भूतों के भी इतनी डरावनी हो गईं कि लोगों ने उन्हें देखना ही छोड़ दिया।

पिछले कुछ समय में भूत कुछ टीवी सीरियलों में भी आए, लेकिन लोग उनमें और सास-बहू सीरियलों में बहुत ज्यादा फर्क नहीं कर पाए। सुना तो यह जाता है कि एक सीरियल में बहू के रोल के लिए किसी अभिनेत्री का मेकअप किया जाता था, तो उसी मेकअप के साथ वह दूसरे सीरियल में भूत का रोल करके भी आती थी। यह भी सुना जाता है कि सास-बहू सीरियल में एक अभिनेत्री एक ही रोल कई साल तक करती रही। बाद में पता चला कि उस सीरियल के दौरान ही वह मर गई थी और कई साल तक उसका भूत वह रोल करता रहा और कोई जान नहीं पाया, यहां तक कि वह खुद भी।

वैसे आज सफेद नाइटी पहनकर गाना गाने वाली भूत नायिकाएं नई फिल्मों में दिखाई नहीं देतीं। इसकी एक वजह तो शायद यह है कि नाइटी भले ही पारदर्शी हो, लेकिन गरदन से पैर के नीचे तक होती है और आजकल इतने कपड़े न नायक पहनता है, न नायिका। दूसरी वजह शायद यह है कि फिल्म उद्योग में इतनी सुरीली गायिकाओं की कमी है, जो भूतों को प्लेबैक दे सकें। जीवित नायिका बेसुरी हो जाए तो चल जाता है, भूत के साथ नहीं चलता।

बहरहाल, ये सारे विचार एक अलग प्रसंग में दिमाग में आए। उद्देश्य यह बताना था कि यथार्थ में भूत मर्द भी होते हैं और इसीलिए उनकी लंगोटी भी होती है, जो हाथ लग जाती है। जैसे अपनी सरकार है, जो जाते हुए एक के बाद एक लंगोटी जनता के लिए छोड़े जा रही है। द्रौपदी की साड़ी की तरह उसकी लंगोटियां भी खत्म नहीं हो रही हैं। भूतों के साथ ऐसा भी होता है।

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