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यादों का साथ

उन्होंने कुछ यादें संजोकर रखी हैं। वह मानते हैं कि यादें उन्हें रिफ्रेश करती हैं और मुश्किल समय में सहारा देती हैं। डॉक्टर टिम वाइल्ड ने यादों पर काफी अध्ययन किया है। वह कहते हैं कि अच्छी यादें हमें अच्छे समय में ले जाती हैं। ये हमें शारीरिक रूप से भी आराम पहुंचाती हैं। जो शख्स हर दिन अच्छे अतीत में लौटता है, वह अपने अच्छे भविष्य की राह खोलता है। दरअसल, ऐसा शायद ही कोई इंसान हो, जो कभी पीछे मुड़कर न देखता हो। लेकिन यादों को छूना एक अलग बात है, और उसमें डूबना बिल्कुल अलग। यादों को आत्मा में उतरने देना चाहिए।

अल्जाइमर जैसी बीमारी में किसी भी चीज को याद रखने में समस्या होती है। इस रोग को कई बरस ङोल चुके रिचर्ड टेलर ने एक खूबसूरत किताब लिखी है- अल्जाइमर फ्रॉम द इनसाइड आउट। किताब में टेलर कहते हैं, ‘जब मैं सब कुछ भूल चुका था, अकेलापन ही मेरा साथी था, जबकि पूरी दुनिया अपने काम में लगी रहती थी।’ वह कहते हैं कि आपका खयाल रखने वाले भी आपसे यही उम्मीद रखते हैं कि जो आप थे, वही आप बन जाएं। उनकी नजर में आप एक पूर्ण इंसान नहीं रह जाते और ऐसे में धीरे-धीरे आप भी इस बात पर यकीन करने लगते हैं।

साफ है कि यादों के बिना हम खुद को खाली महसूस कर रहे होते हैं। इंसान एक लर्निग मशीन ही तो है। जिस दिन हम जन्म लेते हैं, उस दिन से हमारा दिमाग अनुभवों को कैद करना शुरू कर देता है। अनुभवों को वह तंत्रिका संयोजनों के जाल में इनकोड करता है। यह इनकोडिंग ही हमारा भविष्य तय करती है।

यादों पर आधारित किताब इन हेरिटेज ऑफ लॉस की लेखिका किरण देसाई कहती हैं कि यादें आपको एक ऐसी दुनिया में पहुंचा देती हैं, जहां आपका भविष्य और इतिहास एक साथ मिलते हैं और आपको उनसे बात करने का मौका मिलता है। यह तो अपने जीवन को तरोताजा करने जैसा है।

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