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हिंदी और हम

जिस देश में उसके नागरिक अपनी मातृभाषा का पान नहीं करते, उसका भविष्य कभी उज्ज्वल हो नहीं सकता। हिंदी सबसे अधिक वैज्ञानिक भाषा है, लेकिन यह बात बहुत कम हिंदी भाषी जानते होंगे। किसी भी भाषा से ज्ञान हासिल करने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन अपनी मातृभाषा की कीमत पर नहीं। मैं समझता हूं कि अंग्रेजी की हमें जरूरत है विश्व में खड़े रहने के लिए, लेकिन दुनिया में सिर उठाकर खड़े रहने के लिए हमें हिंदी की बहुत आवश्यकता है।

मुझे तकलीफ तब होती है, जब हिंदी की कीमत पर उसकी पैरोकारी की जाती है। देश के धनाढ्य वर्ग की बात तो छोड़ दीजिए, अब मध्य वर्ग में हिंदी के प्रति समर्पण नहीं दिखता। आजकल के मां-बाप अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने को लेकर लालायित नजर आते हैं, हिंदी में तो बच्चे किसी तरह पास भर हो जाएं। ऐसा क्यों है? 2001 की जनगणना के आधार पर ही कहूं, तो देश में 40 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते हैं, दोगुने इसे समझते हैं, फिर भी इसकी यह दुर्गति क्यों है?

वास्तव में, देश के विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में ही हिंदी कोने में धकेल दी गई है। उसकी प्रतिष्ठा लौटाने के लिए हमें आधुनिक तकनीक के नजरिये से भी उसे उपयोगी बनाना होगा। विभिन्न विषयों में स्तरीय लेखन का अभाव इस भाषा के प्रति हमारे बच्चों को उदासीन बना रहा है। इसलिए जिन लोगों को अपने राष्ट्र से प्रेम है, उन्हें यह चुनौती स्वीकार करनी होगी कि इसे हम वैश्विक सम्मान की भाषा बनाएंगे।

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