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भारत-सऊदी संबंध

सऊदी अरब के प्रिंस व डिप्टी पीएम सलमान बिन अब्दुल अजीज हिन्दुस्तान के तीन दिवसीय दौरे पर गए थे। आखिरी दिन साझा बयान जारी हुआ, जिसे अब गहराई से देखने की जरूरत है और यह समझना भी जरूरी है कि हिन्दुस्तान-सऊदी अरब रिश्ता किस मुकाम पर है। दोनों मुल्कों के साझा बयान में कारोबारियों की आवाजाही को सरल बनाने पर जोर डाला गया, ताकि दोनों मुल्कों में निवेश के मौके बढ़ें, खास तौर पर इन्फ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी-ट्रांसफर की दिशा में।

दोनों पक्ष इस बात पर सहमत थे कि इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन्स के मामले में आपसी मदद बढ़ाने की जरूरत है। साथ ही, गए बरसों में सुरक्षा संबंधी सहयोग में तरक्की को संतोषजनक बताया गया। इसमें ट्रेनिंग और हुनर की अदला-बदली को ज्यादा तवज्जो दी गई। दोनों तरफ के नुमाइंदों ने रियाद और नई दिल्ली द्वारा फौजी मदद के करार पर दस्तखत को सराहनीय माना है।

अहम यह रहा कि दहशतगर्दी के खिलाफ अपनी जंग की प्रतिबद्धता को दोनों मुल्कों ने दोहराया है। इसमें कोई दोराय नहीं कि कारोबार व तिजारत हिन्दुस्तान-सऊदी अरब के रिश्ते की सबसे अहम खासियत हैं। साल 2012-13 में 43 बिलियन डॉलर के दोतरफा कारोबार के साथ ही सऊदी अरब हिन्दुस्तान का चौथा सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार बन चुका है। इसमें कच्चे तेल की खरीदारी का बड़ा योगदान है।

साल 2007-08 में दोतरफा कारोबार 23.1 बिलियन डॉलर ही था। कारोबारी रिश्तों में साझा कामकाज और निवेश काफी अहमियत रखते हैं। सऊदी अरब के पेट्रोलियम भंडार में हिन्दुस्तान के मजदूरों की तादाद बढ़ी है। इसके अलावा, ज्यादा से ज्यादा सऊदी कारोबारी और निवेशक हिन्दुस्तान को मुफीद मुल्क मानते हैं। हालांकि, हिन्दुस्तान व सऊदी अरब के रिश्ते काफी पुराने हैं और इनकी संस्कृति जुड़ी हुई है, पर इनके रिश्ते में कूटनीतिक व सियासी गहराई की कमी है। हिन्दुस्तान के ज्यादातर इदारे यह महसूस करते हैं कि सऊदी अरब नई दिल्ली को पाकिस्तानी चश्मे से देखता है। बादशाह अब्दुल्ला के जनवरी 2006 के हिन्दुस्तान दौरे के बाद यह सोच बदलनी शुरू हुई।    

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  • Web Title:भारत-सऊदी संबंध