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साहित्य ही भारतीय जन जीवन का सच्चा दस्तावेज: कुशवाहा

बलरामपुर हिन्दुस्तान संवाद। पूंजी के नंगे नाच के कारण ये मूल्य हिनता का दौर है। विकास के नाम पर हो रही एकांगी प्रगति की विड़बना लोगों को अपनी जड़ो से काट रही है। यह बातें प्रसिद्ध लेखक व संस्कृति कर्मी सुभाग कुशवाहा ने कही। श्री कुशवाहा मंगलवार को एमएलके पीजी कालेज में शोध एवं परास्नातक हिन्दी विभाग के तत्वावधान में आयोजित व्याख्यान समारोह को संबोधित कर रहे थे।

व्याख्यान का विषय था साहित्य का सामाजिक संदर्भ और लोक संस्कृत। श्री कुशवाहा ने अनेक संदर्भो के साथ विस्तारपूर्वक अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने कहाकि नई पीढ़ी के बच्चों जमीन और मिट्टी के अनेक संदर्भो से कटते जा रहे हैं। उन्हें अंकल और अंटी के अलावा मौसा-मौसी, बुआ-फूफा, मामा-मामी जैसे नजदीकी रशि्तों के भी शब्द याद नहीं रह गए हैं। जबकि भारत को समझने के लिए गंभीर विद्वान लोक साहित्य को ही प्रामाणित दस्तावेज मान रहे हैं। व्याख्यान समारोह की अध्यक्षता डा. ओपी मिश्र ने की।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए विभाग के हिन्दी परिषद प्रभारी डा. प्रकाश चन्द्र गिरि ने मुख्य अतिथि के रचनात्मक योगदान का परिचय दिया था तथा अभी हाल ही में पेंगुइन प्रकाश से चौरीचौरा विषय पर प्रकाशित श्री कुशवाहा की पुस्तक की प्रशंसा की। कार्यक्रम में महाविद्यालय के उप प्राचार्य डा. श्रीनविास शुक्ल, डा. माधवराज द्वविेदी, डा. कृपाराम, डा. प्रमिला, डा. नीरजा शुक्ला, डा. चन्द्रेश्वर पांडेय, प्रो. नागेन्द्र सिंह, वमिल वर्मा, डा. एपी वर्मा सहित महाविद्यालय के छात्र-छात्राएं मौजूद रहीं। ं।

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