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यूक्रेन- अतीत की गलतियों का नतीजा

सोवियत संघ के पतन के बाद कई लोगों को उम्मीद थी कि शीत युद्ध वाली विचारधारा अब अतीत की चीज होकर रह जाएगी। अब दुनिया भर की ताकतें एक बेहतर संसार बनाने के लिए आपस में पहले से ज्यादा सहयोग करेंगी। यह मान लिया गया था कि नाटो का काम अब खत्म हो चुका है। ऐसे कई तरीके थे, जिनसे पूर्वी यूरोप में सोवियत संघ के पूर्व सदस्यों को भविष्य के लिए सुरक्षा दी जा सकती थी। नाटो ने यह सुरक्षा देने के लिए पूर्व की तरफ बढ़ते हुए रूस की सीमा तक अपने पांव जमा लिए। उस समय, जब सोवियत संघ के राष्ट्रपति गोर्बाच्येव अमेरिकी विदेशी सचिव जेम्स बेकर से  इस मसले पर वार्ता कर रहे थे, तब उनका जोर इस बात पर अधिक था कि अमेरिका को अपने पांव पूर्व की ओर नहीं फैलाने चाहिए। दरअसल, यह  ऐसा इलाका है, जहां परंपरागत रूप से रूस का प्रभाव रहा है। लेकिन अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने नाटो गठबंधन की सेनाओं को रूस की सीमा तक पहुंचा दिया। तब यहां तक कहा गया था कि सेनाओं की तैनाती यूक्रेन और जॉजिर्या तक हो जानी चाहिए।

गोर्बाच्येव से हुई वार्ता के बावजूद नाटो सेनाओं को पूर्व की तरफ बढ़ाने की यह नीति भड़काने वाली ही थी। यह नीति नासमझी भरी भी थी और इसमें रूस के लिए यह चेतावनी छिपी थी कि यूरोप के प्रबंधन या विश्व के अन्य मामलों में हम तुम्हें अपने बराबर का सहयोगी नहीं बनाना चाहते हैं तथा हमारे पास जो ताकत है, उसका इस्तेमाल हम खुद करेंगे और तुम्हें इसे स्वीकार करना होगा। एक साल बाद, तब यह संदेश और भी जोरदार तरीके से दिया गया, जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने पोलैंड और चैक गणराज्य में एंटी बैलेस्टिक मिसाइलों की तैनाती की कोशिश शुरू की। उस समय अमेरिका का कहना था कि ऐसा ईरान को ध्यान में रखकर किया जा रहा है, लेकिन रूस को इस तर्क पर यकीन नहीं था। पूरा पश्चिमी खेमा इस तरह काम कर रहा था, जैसे शीत युद्ध अभी जारी है।

कुछ समय पहले जॉजिर्या में जो हुआ और इस समय क्रीमिया में जो हो रहा है, वह दरअसल पश्चिम की उन्हीं गलतियों का नतीजा है। पश्चिमी देश एक साल से भी ज्यादा समय से यही कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरह यूक्रेन नाटो में शामिल हो जाए। यूक्रेन में यूरोप समर्थक सरकार बनाने के लिए वे कुछ भी करने का तैयार हैं। इसके लिए उन्होंने रूस समर्थक सरकार का विरोध भी किया और उसे गिराने की कोशिशें भी। जनवरी महीने में एक विश्लेषक ने कहा था कि इस चक्कर में पश्चिम के देश जिन ताकतों का समर्थन कर रहे हैं, वे फासीवादी हैं, नाजीवादी हैं, और यहूदी विरोधी भी हैं। इसमें कहीं गई अगर एक भी बात सच है, तो पश्चिम ने अपने भविष्य के लिए एक बार फिर गलत सहयोगी चुना है। यूक्रेन में रूसी अल्पसंख्यक भारी संख्या में हैं और उन्हें बचाने के लिए रूस किसी भी हद तक जा सकता है।

इसके अलावा, अगर रूस के मौजूदा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को लगता है कि पश्चिम यूक्रेन को नाटो में शामिल करने की फिराक में है, तो वह इसके विरोध में निश्चित तौर पर कदम उठाएंगे, क्योंकि उन्हें क्रीमिया की तरफ से काले सागर तक पहुंचने का रास्ता चाहिए। साथ ही, वह अपने उन सैनिक ठिकानों की सुरक्षा की पूरी व्यवस्था भी चाहेंगे, जो वहां उसके हितों की रक्षा के लिए कायम किए गए हैं। क्रीमिया में रूस की जो संपत्ति और उसके जो प्रतिष्ठान हैं, उनकी रक्षा हमेशा से ही रूस की पहली प्राथमिकता रही है। पश्चिम के नेता और पश्चिम का मीडिया, दोनों इस मामले को हमेशा एकपक्षीय ढंग से दिखाते रहे हैं, जैसे इस मामले में सिर्फ रूस की गलती हो और रूस के राष्ट्रपति पुतिन एक देश में उभर रहे लोकतंत्र का रास्ता रोक रहे हों। गड़बड़ी की जड़ इस मामले में दरअसल तभी शुरू हो गई थी, जब सोवियत संघ के पतन के बाद गोर्बाच्येव के साथ हुई इस सहमति को नहीं माना गया कि नाटो पूर्व की तरफ अपने कदम नहीं बढ़ाएगा।

यह लगभग उसी समय तय हो गया था कि इसे लेकर भविष्य में समस्याएं पैदा होंगी ही। अब जो समस्या है, उसका कोई सरल समाधान नहीं दिखता है। समाधान तो तभी निकल सकेगा, जब पश्चिम की अतीत की गलतियों को ठीक किया जाए। यह एक जटिल और खतरनाक समस्या है, इस बात को उन लोगों को समझना होगा, जो यूक्रेन के वर्तमान को तोड़ने-मरोड़ने में लगे हुए हैं। इस पूरे मामले का एक और पक्ष है, जिसके कारण पश्चिमी ताकतों को भविष्य को लेकर अभी से सचेत हो जाना चाहिए। अमेरिका इस समय पश्चिमी प्रशांत सागर में जिस नीति पर चल रहा है, वह मूर्खतापूर्ण भी है और खतरनाक भी। अमेरिका वहां चीन की बढ़ती ताकत को नियंत्रित करना चाहता है।

पेंटागन के एक पूर्व अधिकारी जोसेफ नये ने भी कहा है कि लगातार उभर रहे चीन के प्रति अमेरिका का यह रवैया ठीक नहीं है, इसकी बजाय उसकी नीति सहयोग की होनी चाहिए। जिस समय यह सब हो रहा है, उसी समय चीन और रूस के बीच सामरिक समझौते के संभावनाओं की भी चर्चा चल रही है। अमेरिका इस समय यूक्रेन को लेकर जिस तरह की गलत नीति पर चल रहा है, वह नीति चीन और रूस को सामरिक सहयोगी बना सकती है। साफ है, जो लोग यह सोचते थे कि शीत युद्ध खत्म हो चुका है और अब एक बेहतर दुनिया की उम्मीद बनेगी, वे गलत थे। इस समय दुनिया के जो नीति-नियंता हैं, वे तेजी से बदल रहे घटनाक्रम को ठीक से समझते हुए नहीं दिखाई दे रहे हैं। उनमें ऐसा सामथ्र्य नहीं है कि वे आपसी सहयोग के साथ दुनिया को कठिन हालात से निकालने के लिए प्रेरणा दे सकें।
गाजिर्यन से साभार
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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