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इन बंजारों को अपने जैसा कब मानेंगे हम

बंजारा और बागड़ी समुदाय आज भी एक कथानक ढो रहा है। इस समाज के बुजुर्ग बताते हैं कि हम महाराणा प्रताप के उस दौर के वंशज हैं, जब वह सम्राट अकबर से हारकर जंगलों में घास की रोटियां खाकर अपनी शक्ति का पुनर्गठन कर रहे थे। उनके घरों में रात में दीपक नहीं जलता। जब ये अपने डेरे बदलते हैं, तो खाट उल्टी करके चलते हैं। ये घर नहीं बनाते, घास-फूस की झोपड़ियों में रहते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि ये बंजारे दरअसल यूरोप से आए जिप्सी समुदाय के लोग हैं, जो कालांतर में भारतीय समाज मे घुल-मिल गए। कहा जाता है कि ये बंजारे औरंगजेब की सेना के साथ दक्षिण भारत पहुंचे। कैप्टन ब्रिग्स ने लिखा है कि ये बंजारे सेना का शिविर लगाने, राशन व साजो-सामान पहुंचाने वगैरह का काम करते थे। दक्षिण में अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान के विरुद्ध युद्ध में बंजारों से गुप्तचर का काम भी लिया। यह समुदाय अनिवार्य रूप से हिंदू होता है और गुर्जर, जाट, पुंडीर, चौहान आदि जातियों में बंटा होता है। इनके यहां सगोत्र और सजातीय विवाह पर पाबंदी है।

देश में हो रहे तेज सामाजिक बदलाव से अलग रहकर ये बंजारे अभी अपनी परंपराओं को जीवित रखना चाहते हैं। लेकिन अब यह बहुत आसान नहीं है। बंजारों ने पशुपालन को ही अपना शुरुआती पेशा बनाया था। इससे उनको विस्थापन में सुविधा भी होती थी। लेकिन स्थानीय बाजारों की अपेक्षा जब ये अपने जानवर सस्ते दामों पर बेचते थे, तब ये स्थानीय व्यापारियों और दलालों के कोपभाजन बनते गए। फलत: अब ये लोहे के छोटे-मोटे कारोबार करने लगे हैं। ये शहर के कबाड़ी से लोहा खरीदते हैं और कुल्हाड़ी, दराती, हंसिया और कड़ाही बनाते हैं। शहरों में इस समुदाय के लोग रिक्शा भी चलाते हैं और मजदूरी भी करते हैं। इनका कोई स्थायी ठिकाना नहीं है, शिक्षा की रोशनी इनके डेरों तक नहीं पहुंच सकी है। न तो इनका वोटर लिस्ट में नाम है, और न ही इनके पास राशन कार्ड है। इसलिए राजनीतिक दलों के लिए भी ये आकर्षण नहीं हैं।

जिन गांवों के बीच में ये अपने डेरे बना लेते हैं, उनसे ये जल्द ही घुल-मिल जाते हैं, लेकिन गांव में चोरी-डकैती की कोई घटना हुई, तो पुलिस सबसे पहले इन्हीं पर शक करती है। पुलिस की प्रताड़ना आज भी बंजारों की पहली शिकायत है। नक्सल प्रभावित राज्यों में बंजारा समुदाय दोहरी मार का शिकार हुआ है। नक्सलियों को लगता है कि पुलिस उनकी मुखबिरी कराने के लिए बंजारों का इस्तेमाल करती है, वहीं पुलिस को लगता है कि बंजारे नक्सलियों से मिले हुए हैं। मुख्य समस्या यह है कि उन्हें कोई अपने जैसा मानने को तैयार नहीं है। फिर भी हम मानते हैं कि वे देश की मुख्यधारा का हिस्सा बन जाएं। लेकिन यह भी सच है कि इसी मुख्यधारा के द्वार पर उनका स्वागत नहीं होता, बल्कि यहां से उनके लिए परेशानियों का दौर शुरू हो जाता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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