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दिल का दर्द

अब दिल की बीमारी आम हो गई है। दिल की बीमारी से होने वाली मृत्यु-दर में भी वृद्धि हुई है। पहले जब चिकित्सा सुविधाएं अधिक नहीं थीं, तब भी लोग दिल की बीमारी का शिकार होते थे, लेकिन संख्या कम थीं। कैलिफोर्निया में हुए शोध दर्शाते हैं कि जिन लोगों का पारिवारिक जुड़ाव कम होता है, जो तनावग्रस्त और नकारात्मक प्रवृत्तियों से घिरे हुए रहते हैं, उनमें दिल की बीमारियां, रक्त-संचरण समस्या के खतरे अधिक बढ़ जाते हैं। दिल का दर्द खान-पान के साथ ही मानसिक स्तर पर जुड़ा हुआ होता है। बढ़ते तनाव, स्पर्धा, अनियमित खान-पान, बढ़ते प्रदूषण, भाग-दौड़ भरी शहरी लाइफ स्टाइल ने बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को प्रभावित किया है। दिल का दर्द उस समय अधिक बढ़ता है, जब व्यक्ति स्वयं को असहाय पाता है।

इससे उबरना हर किसी के लिए आसान नहीं होता। ऐसे समय में दिल पर पड़े बोझ को कम करने के लिए व्यक्ति के साथ किसी ऐसे व्यक्ति का होना बेहद जरूरी है, जो पीड़ा और दर्द को कम कर सके। हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के इंस्ट्रुक्टर एरिक लूक्स कहते हैं कि, ‘घर-परिवार, गहरी दोस्ती और खुशमिजाज स्वभाव, ये तीन ऐसे तत्व हैं, जो दिल के लिए बेहद अच्छे साबित होते हैं।’ गुस्सा, ईष्र्या, लोभ व्यक्ति के कोलेस्ट्रॉल को तेजी से बढ़ाते हैं। इससे दिल की बीमारियों की आशंका बढ़ जाती है। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और शरीर संक्रमण का शिकार हो सकता है। आज हर तरफ यही हो रहा है। दिल का दर्द जान का दुश्मन बन बैठा है। इस शत्रु को दिल से निकालने के लिए जरूरी है कि आप सहज-सरल मुस्कान, सद्विचार, सद्भावना और सद्कर्मों को अपने जीवन का एक नियमित अंग बना लें। जब मुस्कान के साथ ही सद्गुण व्यक्तित्व में जुड़ जाएंगे, तो दर्द को दिल में उतरने का अवसर ही नहीं मिलेगा। जीवन खुशहाल और मजबूत दिल के साथ खिलेगा।

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