DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मिली-जुली आबादी बनी प्रभावी वोटर

शहरीकरण की हदें फैलने के बाद देश के कई हिस्से अर्धशहरी इलाकों में तब्दील हुए हैं। नतीजा इन इलाकों के मतदाताओं को ‘रूरबन’ नामक नई संज्ञा मिली है। ग्रामीण और शहरी छाप लिए इन मतदाताओं की आगामी चुनाव में एक बड़ी संख्या रहेगी।

बढ़ती जनसंख्या और बढ़ती शहरीकरण की प्रवृत्ति के कारण देश में एक दशक में एक नया इलाका तैयार हो गया है। इसे जानकारों ने रूरबन नाम दिया है यानी रूरल (ग्रामीण) और  अरबन (नगरीय) का मिश्रण। इसे हम सेमी रूरल या अरबन भी कह सकते हैं। यह नई श्रेणी बेहद शक्तिशाली आंकी जा रही है। यह न सिर्फ बाजार और अर्थव्यवस्था की दशा दिशा तय कर रही है बल्कि 2014 के चुनाव में कई पार्टियों की तकदीर को बना—बिगाड़ भी सकती है। इस क्लास की एक विशेषता यह है कि इसके अस्तित्व में ज्यादातर गैर उच्च जाति वर्ग का योगदान है। इस तबके के वोटर के संकेत बड़े उत्साहजनक हैं। 2009 के चुनाव में जब स्थापित शहरी वोटर में मतदान के प्रति कोई उत्साह नहीं देखा गया था तब इस नए बने वोटर वर्ग ने मेट्रो सिटी बेंगलुरु, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली और मुंबई के मुकाबले 10 प्रतिशत ज्यादा मतदान किया था। यह प्रतिशत तो ग्रामीण लोकसभा क्षेत्रों के मुकाबले भी कहीं ज्यादा था।

कैसे बढ़ा रूरबन तबका
एक दशक में रूरबन तबके न सिर्फ प्रगति की बल्कि परिपक्वता हासिल कर उम्मीदें भी जगाईं। इनकी संख्या और शक्ति का अनुमान सेंसस टाउन के आधार पर लगाया जा सकता है। ये टाउन नगर पालिका ढांचा नहीं है और ये पंचायतों से संचालित होते हैं। देश की वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक 5,000 से कुछ ज्यादा टाउन थे। इनमें 1,200 सेंसस टाउन का चरित्र रूरबन था। एक दशक बाद 2011 में ऐसे टाउन की तादाद 8000 हो गई। इनमें चार हजार सेंसस टाउन थे यानी पंचायत प्रशासन में सेंसस टाउन के तहत शहरीकरण में 90 प्रतिशत की बढ़ोतरी एक दशक में दर्ज की गई। यह भारत में रूरबन इलाका बनना सबसे चौंकाने वाला और विशिष्ट पहलू है। यह वर्ग निश्चित रूप से वर्ष 2014 के चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

क्या है इसका गूढ़
रूरबन बाजार का जो रूपांतर हुआ है वह दिलचस्प है। गांवों का शहरी चरित्र तब आता है जब बड़ी  संख्या में लोग खेती—पाती छोड़ देते हैं। शहर की दो अवधारणाएं हैं.. एक यह कि शहर वह है जहां 25 प्रतिशत से कम आबादी खेती—पाती से जुड़ी है। दूसरी यह कि 5,000 की जनसंख्या में निम्नतम घनत्व प्रति वर्ग किलोमीटर 400 व्यक्ति हो। एक अध्ययन के अनुसार पिछले एक दशक में 75 प्रतिशत फैक्टरियां ग्रामीण भारत में लगीं। इनसे 70 प्रतिशत नए निर्माण रोजगार पैदा हुए। आज भारत की उत्पाद जीडीपी का 55 फीसदी योगदान ग्रामीण भारत से है।

हर राज्य की प्रवृत्ति अलग
रूरबन तबके की प्रवृत्ति हर राज्य में अलग होती है। यह निर्भर इस बात पर करता है कोई राज्य औद्योगिक रूप से कितना विकसित है। सबसे पहले इस सेगमेंट में कई गांवों का क्लस्टर बनता है। यह खेती पर अपनी निर्भरता छोड़ता है। उपयुक्त उत्पाद और खपत इकाइयों का निर्माण करता है। कुछ अर्थव्यवस्थाएं इस तरह के सेगमेंट को सिरे से खारिज करती हैं। उनका तर्क होता है कि यह वर्ग बिना किसी नीति योजना के अस्तित्व में आता है। इसलिए इसमें वह बात नहीं होती, लेकिन यहां सिर्फ शुद्ध अर्थशास्त्र से नहीं देखना चाहिए। इस तरह की अनियोजित इकोनॉमी की सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से गहरी प्रवृत्तियां होती हैं। इसलिए भारत के रूरबन को नकारने से पहले इसके गहन अध्ययन की जरूरत है। देखा जाए तो हर राज्य दूसरे से अलग तस्वीर रखता है। गुजरात का खांचा—ढांचा उत्तर प्रदेश या किसी अन्य पिछड़े राज्य से अलग हो सकता है। गुजरात के इस सेगमेंट में जटिलताएं कम हैं। इसलिए गुजरात की सरकार विकास पर इतने स्पष्ट रूप से दावा करती है। इसलिए गुजरात की सरकार के कर्ता—धर्ता यह भी मानते हैं कि यही स्पष्टता या आर्थिक विकास दूसरे राज्यों में भी किया जा सकता है, लेकिन दूसरे राज्यों की जटिलताएं इसमें रोड़ा बन सकती हैं। करीब 10 साल पहले जब 14वें लोकसभा चुनाव हुए थे, तब खेती ग्रामीण सकल उत्पाद की लगभग आधी थी। आज यह ग्रामीण जीडीपी की महज 25 प्रतिशत रह गई है। इससे साफ है कि एक संगठित ग्रामीण नगरीकरण की प्रक्रिया पूरे देश में चल  रही है। यह वर्ग और इसकी आगे बढ़ने की आंकाक्षाएं इतनी बलवती हुई हैं कि यह राजनीतिकों के लिए ऐसा वोट वर्ग बन गया है जो राजनीति की दशा—दिशा को सीधे प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि रूरबन को लुभाने के लिए राजनीतिक दल लगातार जुटे हुए हैं।

शहरी मतदाता जैसा होता है रूरबन मतदाताओं का व्यवहार
जनसंख्या का एक बड़ा भाग जो रूरबन कहलाता है जो पिछले कुछ लोकसभा चुनावों से बिल्कुल शहरी मतदाता की तरह व्यवहार करता है। यह समूह अपनी इच्छाओं के बारे में धर्म और जाति से ऊपर उठकर देखता है। शहरी क्षेत्रों में आने वाली सीटों की संख्या के बारे में कई दावे हैं, लेकिन विकास का सबसे अधिक फायदा मिला इस वर्ग को।
देश में हो रहे आर्थिक विकास का सबसे अधिक फायदा रूरबन क्लास को ही हुआ है। इसकी वजह यही है कि देश में सबसे अधिक विकास ही शहरी या अर्धशहरी क्षेत्र का हुआ है। इस वर्ग के लोग अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करते हैं और इसके लिए शिक्षा या अन्य तरह के ऋण लेने से भी गुरेज नहीं करते। रूरबन क्लास से संबंधित लोग राजनीति में पूरी तरह से भाग लेते हैं और चुनाव परिणामों पर सबसे अधिक प्रभाव डाल सकते हैं।
(चुनाव डेस्क)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:मिली-जुली आबादी बनी प्रभावी वोटर