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यह तबका निर्णायक नहीं है

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में ‘रूरबन’ एक नया ‘टर्म’ है, किंतु आर्थिक व उपभोक्तावादी मोर्चे पर इसकी पहचान पुरानी और व्यापक है। इसी तरह मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में यह टर्म अस्तित्व में होने के बावजूद ‘अपरिभाषित’ है। ऐसे में, अगले आम चुनाव में यह तबका क्या किरदार निभाता है, इस पर सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोशाइटीज (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार से प्रवीण प्रभाकर की बातचीत:

आम चुनाव में ‘रूरबन’ तबके का क्या प्रभाव रहेगा?
हमने यह टर्म ‘डिफाइन’ नहीं किया है। अनाधिकृत शहरीकरण से एक तबका उभरा है, जो अर्धशहरी जिंदगी जी रहा है इसका चरित्र बहुत कुछ निम्न मध्यवर्ग या इससे थोड़ा नीचे जैसा है। लेकिन राजनीति में इसके प्रभाव को देखें, सिवाय दिल्ली के, जहां वर्ग आधारित वोटिंग हुई थी, तो फिलहाल यह व्यापक नहीं है। इसे अलग-अलग राज्यों के हिसाब से देखें, तो स्थिति और स्पष्ट होगी। मसलन, बिहार और उत्तर प्रदेश में ‘क्लास’ नहीं, बल्कि ‘जाति’ हावी है। महानगरों में ही तबका, वर्ग या ‘क्लास’ की लामबंदी दिखती है। गांवों-कस्बों और छोटे शहरों में नहीं। इसलिए इस तबके को निर्णायक मानकर नहीं चला जा सकता।

लेकिन हाल के वर्षों में यह आबादी बड़ी हुई है और चूंकि यह उपभोक्तावादी है, इसलिए जागरूक भी है। तमाम रुझानों में इस ‘वर्ग’ की बात है।

रुझान तो दिखेंगे ही, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये रुझान सचमुच वोट में बदल पाएंगे? दिल्ली विधानसभा चुनाव में बाहरी दिल्ली के क्षेत्र में यह रुझान दिखा, लेकिन देश और आम चुनाव के स्तर पर इसका झुकाव किसी एक पार्टी की ओर दिखे, यह मुमकिन नहीं लगता है। किसी राजनीतिक पार्टी को वोट देने के कई कारण होते हैं। वहां जाति, समुदाय बड़े कारण हैं। फिर मुद्दे और चुनावी वादे कारगर हैं। इसके बाद, लोग उम्मीदवारों का आकर्षण भी एक मुद्दा है, लेकिन इस तबके को ध्यान में रखकर किसी पार्टी ने कोई कार्यक्रम नहीं बनाया है। जहां तक गरीब तबका है, वह गोलबंद हो सकता है, क्योंकि उसके लिए पार्टियां नीतियां बनाती हैं। इसलिए निम्न-मध्यवर्ग अपने अस्तित्व के बावजूद मतदान में उभरकर नहीं आता है।

फिर दिल्ली में यह तबका कैसे लामबंद हुआ?
क्योंकि, दिल्ली सचमुच में ‘कॉस्मोपॉलिटन सिटी’ है। यहां माइग्रेंट लोगों की संख्या अधिक है। लोग जाति, धर्म या समुदाय के आधार पर नहीं, बल्कि अपनी आर्थिक जरूरतों के हिसाब से बसे हैं। हालांकि, अब कहीं-कहीं यह दिखने लगा है कि केरल के लोग अधिक हैं, तो कहीं बिहार के लोग। लेकिन फिर भी दिल्ली एलआईजी, एमआईजी, एनऑथराइज्ड और झुग्गी-झोपड़ी कॉलोनियों में बंटी हुई है। आबादी में बड़ी विविधताएं दिखती हैं। इस कारण यहां क्लास ‘री-इन्फोस्र्ड’ होता है और यह जाति या समुदाय पर हावी हो जाता है। दरअसल, इस ‘सेटलमेंट पैटर्न’ ने ही इस तबके को बीते दिल्ली विधान सभा चुनाव में उभारा था।

यह दिखता आया है कि इस तरह के वर्ग के लिए ‘अपनी जरूरत’ के मुद्दे चुनाव में बड़े होते हैं। तो क्या इस बार भी कुछ ऐसा ही होगा?
पिछले कई लगातार आम चुनावों से हम यही देखते आए हैं कि स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय मसलों पर हावी हो जाते थे। लेकिन इस बार राष्ट्रीय मुद्दे उभरकर सामने आए हैं और यह भी साफ है कि ये मुद्दे सचमुच में राष्ट्रीय हैं। इनमें दो मुद्दे प्रमुख हैं। पहला भ्रष्टाचार और दूसरा, खाने-पीने के सामान के बढ़ते दाम यानी महंगाई। वैसे, महंगाई के मुद्दे पर पहले भी चुनाव लड़े गए, लेकिन भ्रष्टाचार इस बार एक व्यापक मुद्दा बना है और इस आधार पर वोटिंग पैटर्न दिख सकता है।

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