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शुरुआत में फिल्म स्कूलों को लेकर संशय में थे सत्यजीत

शुरुआत में फिल्म स्कूलों को लेकर संशय में थे सत्यजीत

भारत के शीर्ष फिल्म स्कूल पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीटयूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) में पढ़ा चुके के.रामचंद्र राव ने बताया कि जानेमाने निर्देशक सत्यजीत रे शुरुआत में फिल्म स्कूलों को लेकर संशय में थे लेकिन बाद में उन्होंने अपना विचार बदल लिया।

जानेमाने संपादक राव पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीटय़ूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) में उस समय प्रोफेसर थे जब 1969 और 1974 में सत्यजीत वहां आए थे।

उन्होंने बताया कि मेरे पास रे के एफटीआईआई के 1969 के दौर की विशद यादें हैं। उन्होंने शिक्षकों और छात्रों से बातचीत में तीन दिन गुजारे थे। पांच साल बाद 12वें दीक्षांत समारोह के अपने उद्बोधन में वह फिल्म स्कूलों के बारे में बोले।

सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीटयूट (एसआरएफटीआई) में रविवार को आयोजित राष्ट्रीय छात्र फिल्म पुरस्कारों के समापन समारोह में प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए राव ने कहा कि पहले सत्यजीत फिल्म स्कूलों को लेकर संशय में थे, लेकिन एफटीआईआई के पहले दौरे के बाद उन्होंने अपना नजरिया बदल लिया।

उन्होंने दीक्षांत में सत्यजीत के भाषण के बारे में बताया जिसमें महान निर्देशक ने फिल्म स्कूलों की महत्ता को समझा।

उन्होंने कहा कि महान निर्देशक का सिनेमा का नजरिया युवा फिल्म निर्माताओं का था जो अपने काम को अच्छी तरह जानते हैं, जिनके पास अपने खुद के देश और खुद की पीढ़ी के बारे में बताने के लिए कुछ होता है।

समापन समारोह में उपस्थित राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता सिनेमैटोग्राफर ए. के. बीर ने फिल्मनिर्माण की नैतिकता, सिद्धांतों और तार्किकता पर बल दिया।

उन्होंने कहा कि ये सार्वभौमिकता की स्थिति पाने के लिए रचनात्मक वृत्ति को सक्षम बनाती हैं। कल्पना एक अन्य कारक है जो रचनात्मकता की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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