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पंचायती राज से निकलेगी विकास की गंगा

इस बार में दो राय नहीं है कि लगातार बढ़ती विकास दर और इसके साथ ही हो रहे कर सुधार से सरकार का राजस्व चमत्कारी ढंग से बढ़ा है। खासतौर पर पिछले चार साल में। इसका नतीजा यह है कि सामाजिक क्षेत्र पर खर्च भी बढ़ा है। जिला पंचायतों के राष्ट्रीय अधिवेशन में प्रधानमंत्री ने बताया था कि पिछली सरकार ने अपने आखिरी साल में गरीबी उन्मूलन और ग्रामीण विकास पर जितना पैसा खर्च किया था, इस समय उससे चार गुना खर्च हो रहा है। 2003-04 में यह खर्च 34,000 करोड़ रुपए था जो अब बढ़कर 1,20,000 करोड़ रुपए हो गया है। लेकिन फिर यह अंतरविरोध क्यों है कि जब हमारी अर्थव्यवस्था के कुछ सेक्टर काफी तेजी से तरक्की कर रहे हैं, जबकि मेहनतकश आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं? ऐसा क्यों है कि भारत समृद्ध हो रहा है, जबकि ज्यादातर भारतीय समृद्ध नहीं हो रहे?ड्ढr पिछले साल आई अजरुन सेनगुप्ता कमेटी की रिपोर्ट काफी सदमा देने वाली थी। इस रिपोर्ट के अनुसार हमारी आबदी के 75 फीसदी लोगों की हालत इतनी खराब है कि उन्हें हर रो 20 रुपए पर ही गुजारा करना होता है। यही वजह है कि हम स्ांयुक्त राष्ट्र मानव विकास इंडैक्स में 120वें नंबर पर हैं। ऐसे में जब हम समावेशी विकास की बात कर रहे हैं तो एक भारत वह है, जिस पर हमें इसलिए गर्व है क्योंकि हम करोड़पतियों की आबादी के मामले में जापान से भी आगे निकल गए हैं। सच यह है कि इस मामले में हम अमेरिका से ही पीछे हैं। लेकिन समावेशी विकास का अर्थ है देश के बहुसंख्यक आदमियों और औरतों के हालात को सुधारना। कोई शक नहीं कि कुछ सुधार हुआ भी है। गरीब और गरीब नहीं हुए हैं। लेकिन अमीर बहुत ज्यादा अमीर हो गए हैं। प्रोफेसर अमर्त्य सेन ने हाल में अपने एक लेख में कहा था कि विश्व अर्थव्यवस्था के असंतुलित विकास से भारत की अर्थव्यवस्था भी असंतुलित हो गई है। दो सूचकांकों पर नार डालना जरूरी है। देश के उदारवादी दौर के पहले एक दशक में अति गरीब तबकों का उपभोग 12 रुपए रोना से बढ़कर 20 रुपए रोना हो गया। इसकी वृद्धि दर 51.2 फीसदी से बढ॥कर 55 फीसदी हो गई। अब जरा देखें कि इस दौरान कार्पोरट सेक्टर का क्या हुआ? जबकि रिार्व बैंक के डिप्टी गवर्नर राकेश मोहन के अनुसार कार्पोरट सेक्टर का शुद्ध मुनाफा जो 1से 1तक 21.1 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहा था, वह 2006-07 तक 47 फीसदी की बुलंदी तक पहुंच गया। इसी दौरान अस्सी के दशक तक 5.7 फीसदी की रफ्तार से बढ़ने वाला कृषि क्षेत्र दो फीसदी की सालाना विकास दर पर पहुंच गया। हमारी आबादी के दो तिहाई लोग इसी क्षेत्र पर निर्भर हैं। कृषि की विकास दर कम होने का एक बड़ा कारण यह भी है कि इस दौरान उत्पादन और सेवा क्षेत्र ने काफी तेजी से तरक्की की है और जीडीपी को काफी बढ़ा दिया है। इसकी वजह से सकल घरलू बचत भी बढ़ते हुए 33 फीसदी तक जा पहुंची है। इसी रकम का कार्पोरट सेक्टर में निवेश हुआ है, जबकि इस दौरान कृषि में निवेश हुआ नहीं है। यह तो अतीत की बात है, लेकिन इसका भविष्य क्या है? दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स के प्रतिष्ठित सेंटर फॉर डेवलपमेंट इकॉनमिक्स ने अनुमान लगाया है कि 2002-03 में कृषि क्षेत्र का जीडीपी 3000 अरब रुपए का था जो दस साल में बढ़कर 4000 अरब रुपए से ज्यादा पर नहीं पहुंचेगा। जबकि उत्पादन और सेवा क्षेत्र का जीडीपी इस दौरान 000 अरब रुपए से बढ़कर 20,000 करोड़ रुपए पर पहुंच जाएगा। यानी दोनों के बीच की खाई और चौड़ी होगी। हम एक पूर्ण लोकतंत्र हैं- दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व वाला लोकतंत्र। हमारी इस अर्थव्यवस्था में देश की बहुसंख्यक आबादी एक व्यक्ित एक वोट के सिद्धांत से पंचायत के विभिन्न स्तरों के लिए पांच साल में छह बार मतदान करती है। देश के किसी ने किसी हिस्से में तकरीबन हर रो किसी न किसी तरह का चुनाव हो रहा होता है। इसलिए हमें एक ऐसी स्थाई आर्थिक नीति चाहिए, जो लोकतांत्रिक हो। यह सच है कि आर्थिक इतिहास में ऐसी विषमताओं के बहुत से उदाहरण हैं जो विकास की वाहक बनीं। आर्थिक इतिहास यह भी कहता है कि अंत भला तो सब भला। एक बार अगर सब ठीक स्थिति में पहुंच गए तो आर्थिक और राजनैतिक स्थिरता का कोई महत्व नहीं। लोकतंत्र के लिए कोई भी आर्थिक नीति प्रति व्यक्ित आमदनी के आंकड़ों पर आधारित नहीं हो सकती। कामयाब भारतीयों की आमदनी के एक बहुत छोटे से हिस्से से अति गरीब व्यक्ित की आमदनी बहुत ज्यादा बढ़ सकती है। यह काम रातोंरात नहीं हो सकता। यह देखते हुए कि बीस साल पहले राजीव गांधी ने कहा था कि सरकार अगर एक रुपया खर्च करती है तो नीचे लोगों तक 15 पैसा ही पहुंच पाता है। और संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के बाद आज भी हमारी नौकरशाही व्यवस्था का यह तथ्य बदला नहीं है। इन संशोधनों के जरिए यह कोशिश की गई थी कि सरकारी नीतियों को लागू करने का जिम्मा नौकरशाही व्यवस्था के बजाए लोगों के उन प्रतिनिधियों को सौंपा जाए जो सीधे लोगों की जरूरतों से जुड़े हैं। यानी जमीनी स्तर पर विकास जमीनी स्तर के लोकतंत्र के जरिए ही हो। दुनिया के सभी विकसित लोकतंत्र स्थानीय स्तर की लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ धीर धीर विकसित हुए हैं। इनमें शताब्दियां लग गईं। ब्रिटेन में तो मैग्नाकार्टा से लेकर बीसवी सदी तक पूरी सहस्त्राब्दी ही लगी। लेकिन हम आजाद होने के साथ ही लोकतंत्र हो गए। और पिछले छह दशक में हमने देश की आजादी को आवाम की आजादी में बदल दिया। यह हमारी सबसे बड़ी राष्ट्रीय उपलब्धि है। हमार लोकतंत्र ने फुनगियों पर फूल खिलाएं हैं, विकसित लोकतंत्र की तरह जड़ें नहीं मजबूत कीं। हमार लोकतंत्र का विकास जड़ों से नहीं हुआ, जड़ों से ऊपर की ओर हो रहा है। यह एक ऐसा काम है, जिसमें काफी समय खर्च हो रहा है, लेकिन कामयाबी काफी महत्वपूर्ण है। हमार यहां ढाई लाख से ज्यादा निर्वाचित स्थानीय निकाय हैं। 32 लाख जनप्रतिनिधि हैं जिनमें 12 लाख औरतें हैं। इसी के साथ अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को पंचायती राज में प्रतिनिधित्व देने की समुचित व्यवस्था है। यह ऐसा सामाजिक और राजनीतिक सशक्ितकरण है जिसकी इतिहास में कोई दूसरी मिसाल नहीं। लेकिन कार्य और आर्थिक संसाधनों के मामले में इन निकायों का सशक्ितकरण अभी बाकी है। केंद्र और राज्यों के बीच इस पर भी एक राष्ट्रीय आम सहमति बनी है और पंचायती राज को ताकत देने का रोडमैप तैयार हो रहा है।ड्ढr

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