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संविधान बदलने के लिए भी करनी होगी चोट

लखनऊ। वरिष्ठ संवाददाता।  लोकतंत्र में पहले ‘गर्वनमेंट बाई द पीपल, ऑफ द पीपल और फॉर द पीपुल’ (‘जनता द्वारा जनता के लिए चुनी गई सरकार, जनता के लिए’) हुआ करती थी। आज यह बदलकर ‘गवर्नमेंट ऑफ द फ्यू, फार द फ्यू, बाई द फ्यू’(कु छ लोगों के लिए चुनी हुई सरकार, कुछ लोगों द्वारा ) हो गई है। यह हुआ है हमारे मतदान के प्रति उदासीन रवैए के कारण। इसलिए वोट की चोट जरूरी है। चाय चौपाल में भाग लेने आए पेस्ट कंट्रोल एक्सपर्ट वीपी सिंह ने कहा कि संविधान आज कुछ चंद लोगों के लिए रह गया है।

बदलाव की जरूरत है। लोग उसका दुरुपयोग कर रहे हैं। फायदा चंद लोग उठा रहे हैं। वक्ताओं ने इस बात पर भी सहमति जताई कि अब बदलाव का समय आ गया है। कुछ ऐसे सख्त कानून भी बनने चाहिए जिसमें 25 फीसदी से कम वोट पाले वालों को तत्काल बाहर किया जाए। सेंट जोजफ स्कूल के अनिल अग्रवाल ने इस मुद्दे से मिलती जुलती बड़ी अहम बात रखी। उन्होंने राजनीति में सुधार की आवश्यकता बताई। कहा, राजनेताओं के भी रिटायरमेंट की उम्र तय होनी चाहिए।

इनकी बात का समर्थन करते हुए कु छ लोग बोले कि हमारे देश में तो रिटायरमेंट के बाद लोग नेतागिरी में आते हैं। कोपल श्रीवास्तव ने इस मुद्दे को आगे बढ़ाया और कहा कि होना यह चाहिए कि नेतागिरी की शुरुआती उम्र 35 वर्ष से 60 वर्ष तक तय होनी चाहिए। विभिन्न संस्थानों से आई महिलाओं ने ऐसे नियमों को बनाए जाने पर भी जोर दिया जिनमें वोट न देने वाले लोगों को कुछ न कुछ सजा का प्रावधान शामिल हो।

अधिक से अधिक जेल होने की सजा इस नियम में शामिल होने से मतदान प्रतिशत में काफी बढ़ोत्तरी हो सकती है। अंशुमाली शर्मा ने कौशल विकास योजना को पाठय़क्रम से जोड़ने की आवश्यकता बताई। कहने लगे नहीं तो बरोजगारी भत्ते की तरह इस योजना के लाभ से भी युवा वंचित रह जाएंगे। पाठय़क्रम से जुड़ने के बाद पढ़कर बाहर निकलने वाले बच्चों चंद रुपयों में अपना व्यवसाय शुरू कर सकेंगे और देश को प्रगतशिील बनाने में योगदान देंगे। कर्मचारी नेता रामराज दूबे ने भी इस बात पर जोर दिया कि अब समय आ गया है कि हर वर्ग के लोग निकलकर वोट करें।

बंद कमरों में बैठकर राजनीति को कोसना बंद करें। उन्होंने अपील की व्यवस्था को कोसने से काम नहीं चलेगा। हथियार हमारे पास है। भारत की राजनीति को हम सब खुद मिलकर बदल सकते हैं।

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