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निराशा में बंधती एक उम्मीद

साल 1951-52 से ही, जब हमारे नए गणराज्य का पहला आम चुनाव संपन्न हुआ था, भारतीय चुनाव आयोग की पहचान एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव संचालक के रूप में निरंतर बढ़ती गई। राजनीतिक पार्टियां और उम्मीदवार इसे एक निष्पक्ष अंपायर के रूप में देखते हैं। हालांकि, वे दूसरे उम्मीदवारों द्वारा समान आचार संहिता के उल्लंघन के प्रति चौकस रहते हैं, पर इसके साथ ही वे सभी समान रूप से चुनाव आयोग के हर फैसले पर गौर करते हैं। दूसरी तरफ, चुनाव आयोग भी इस बात का पूरा खयाल रखता है कि सबके साथ एक समान बर्ताव हो। इसके लिए जरूरी है कि सभी शिकायतों की तेजी से जांच-पड़ताल हो और उन पर पूर्ण आयोग की बैठक में फैसला हो। प्राप्त जानकारियों के प्रति ईमानदारी और सावधानी बरतना ही एक मंत्र है, जो हर आयोग को मानना चाहिए। इसी से तर्कसंगत फैसले और आदेश की राह निकलती है। उम्मीदवारों द्वारा इन फैसलों को स्वीकार करना और देश के स्तर पर इसका मान्य होना, उस सम्मान का संकेत है, जो चुनाव आयोग ने एक महत्वपूर्ण संस्था के तौर पर हासिल किया है।

इसी भावना और तैयारी के साथ चुनाव आयोग ने पिछले आम चुनाव की योजना बनाई थी और उस पर अमल किया था, जिससे एक जून, 2009 को 15वीं लोकसभा का जन्म हुआ। पांच चरणों और 27 दिनों में वह आम चुनाव संपन्न हुआ था और करीब 71 करोड़, 60 लाख मतदाताओं  के 58.40 प्रतिशत लोगों ने अपने वोटों का इस्तेमाल किया। आठ लाख, 35 हजार मतदान केंद्र बनाए गए और 13 लाख इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल हुआ। करीब एक करोड़, 10 लाख अधिकारी और कर्मचारी चुनाव के काम में लगाए गए। चुनाव मैदान में 8,070 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे थे। निर्विवाद रूप से वह आम चुनाव दुनिया में सबसे बड़ा प्रबंधकीय अभ्यास बना था। इसमें न सिर्फ नियम-पुस्तिका को अपनाया गया, बल्कि हर एक रिटर्निंग ऑफिसर को ईमानदारी की कसौटी पर परखा गया। इन सबने मिलकर इस महान काम को शांतिपूर्ण और संतोषप्रद तरीके से अंजाम पर पहुंचाया। फिर भी 15वीं लोकसभा ने हमें निराश ही किया। इसमें कामकाजी घंटों की रिकॉर्ड बरबादी हुई। लंबित विधेयक के मामलों में भी इसने हतोत्साहित किया। इन विधेयकों पर न तो बहस हुई, न ही इनको पारित किया गया। सबसे दुखद तथ्य यह रहा कि यह लोकसभा एक साल में सिर्फ 71 दिन बैठी, जबकि औसतन 127 दिन सत्र चलते हैं। सदन के अंदर कई तरह से बाधाएं पहुंचाई गईं। उनमें से कुछ छवियां हमारे मन में बस गई हैं। जब सदन के नियम को तोड़ा गया, तो कई बार स्पीकर महोदया के चेहरे पर गुस्सा और निराशा के भाव आए।

हम मिर्च-स्प्रे छिड़कने की घटना को नहीं देख सके, क्योंकि उस अंतिम शर्मनाक घटना से हमें बचाने के लिए इसका टेलीविजन स्क्रीन पर प्रसारण बंद कर दिया गया था। लोकसभा के सबसे अमीर सदस्यों में से एक इस घटना में शामिल थे। उन्होंने यह तरीका सदन में अपने ‘विपक्षियों’ को शांत करने के लिए अपनाया था। गए पांच साल में हमने बहुत कम सारगर्भित बहसें देखीं-सुनीं। शायद ही सांसदों ने उन समस्याओं पर चर्चाएं कीं, जो उनके क्षेत्र में मौजूद हैं, या उन निदानों के बारे में बताया, जो उन समस्याओं के संदर्भ में उन्होंने सोच रखे थे। कोई भी यह उम्मीद बांध सकता है कि हम जैसे बड़े देश में, जहां समस्याओं और मुद्दों की भरमार है, सत्ता और विपक्ष समस्याओं व मुद्दों के तार्किक समाधान निकालेंगे। मगर बीते कुछ साल में हम विद्वतापूर्ण और ओजस्वी बहस सुनने में विफल रहे। खासतौर पर राज्यसभा में, जिसके सदस्यों को ‘एल्डर’ कहा जाता है, और इसकी वजह से इसे उच्च सदन माना जाता है। इसकी बजाय, हम जैसे लोग, जो सदन की कार्यवाही का सीधा प्रसारण टीवी पर देखना पसंद करते हैं, शोर-शराबे के अंतहीन घंटों के चश्मदीद बने। इस लिहाज से मुझे नहीं लगता कि लोकसभा की कार्यवाही के सीधा प्रसारण को रोकने का स्पीकर का फैसला कोई दूरदर्शितापूर्ण था।

आखिर 15वीं लोकसभा का गठन एक ऐसी चुनाव प्रक्रिया से ही हुआ था, जिसे देश ही नहीं, दुनिया भर में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी माना जाता है। इस समय स्वघोषित ‘करोड़पति’ सदस्यों की सबसे बड़ी संख्या संसद में है। 543 लोकसभा सदस्यों में से 315, यानी 58 प्रतिशत सदस्य करोड़पति हैं। राज्यसभा के 245 सदस्यों में से कम से कम 100, यानी 40.81 प्रतिशत सदस्य करोड़पति हैं। इसके अलावा, दोनों सदनों के लगभग 30 प्रतिशत सदस्यों ने अपने हलफनामे में आपराधिक पृष्ठभूमि की घोषणा की थी। यदि कुछ विशेषज्ञों के विश्लेषणों पर यकीन करें, तो एक उम्मीदवार की जीत की संभावना अपेक्षाकृत तब बढ़ जाती है, जब उससे धन के साथ आपराधिक पृष्ठभूमि भी जुड़ी हो। ऐसे में, क्या आश्चर्य कि अधिकतर राजनीतिक पार्टियां इसे मूलमंत्र के रूप में अपनाती हैं? चुनाव आयोग के ताजा आंकड़ों में यह बताया गया है कि 18 से 22 साल के नए मतदाताओं की संख्या इस बार बहुत अधिक है। लगभग एक लाख, 80 हजार युवा मतदाता हर संसदीय क्षेत्र में हैं। उनमें से अधिकतर आने वाले चुनाव में पहली बार वोट डालेंगे।

मैं बीते आठ साल से देश भर में छात्रों से मिल रहा हूं। पहले वे उदासीन दिखते थे। वे कहते कि ‘हमें क्यों मतदान करना चाहिए,’ ‘इससे क्या फर्क पड़ जाएगा’, ‘सारे राजनेता एक जैसे होते हैं’ वगैरह-वगैरह। लेकिन अब उस उदासीनता की जगह एक बेचैन ऊर्जा ने ले ली है। अब वे अपनी नौकरी और बेहतर भविष्य के बारे में सोच रहे हैं। इनमें से बेहद कम हैं, जो राजनीति को जाति या धर्म के चश्मे से देखते हैं। सच कहूं, तो युवाओं के साथ हाल की बातचीत में बहुत कम ही ऐसे दिखे। इसी बड़े बदलाव के चलते मैं यह देखता हूं कि नौजवान अपने राजनीतिक प्रतिनिधियों से बड़ी जिम्मेदारी की मांग कर रहे हैं। हमने नतीजे देखे हैं, जब नौजवानों ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के पक्ष में वोट डाले थे। उम्मीद है कि 16वीं लोकसभा पहली बार वोट डालने वालों की आशाएं पूरी करेगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:निराशा में बंधती एक उम्मीद