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जरा आंख में भर लो पानी

पचास साल बाद लताजी ने देशवासियों से फिर यह गुजारिश की- जरा आंख में भर लो पानी। 50 साल पहले उनके इस भाव पर बेशक नेहरूजी की आंखों में पानी भर आया था। पर 50 साल बाद जिनकी फरमाइश पर वह यह गीत गा रही थीं, उनके चेहरे पर खुशी छलक रही थी। वैसे भी आंखों में पानी रहा कहां? अलबत्ता, दिल्ली में इन दिनों मुफ्त पानी मिल रहा है। जो इस मुफ्त की गंगा में हाथ नहीं धो पा रहे, उनकी तो आंखों का पानी भी सूख गया है, टैंकरों की राह तकते-तकते। लताजी की इस दुर्लभ गुजारिश पर किसी ने भी आंखों में पानी नहीं भरा, तो आंध्र प्रदेश से एक माननीय सांसद को शायद यह बहुत बुरा लगा और उन्होंने साथी सांसदों की आंखों में मिर्ची स्प्रे झोंक दिया। बोले- लो अब तो आंख   में भर लो पानी। वैसे आंख में मिर्ची झोंकने की सीख तो महिलाओं को दी जाती है कि इस तरह मिर्ची झोंककर वे अपनी आत्मरक्षा करें। वैसे बताते हैं कि आंध्र वासी कुछ ज्यादा ही मिर्ची खाने के शौकीन होते हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि दूसरों को आंखों के रस्ते मिर्ची का स्वाद चखने के लिए मजबूर किया जाए।

असली कारण यह बताते हैं कि आंध्र प्रदेश के बंटवारे से माननीय सांसद महोदय के बिजनेस पर काफी बुरा असर पड़ने वाला है और इससे उन्हें बहुत मिर्ची लग रही थी, जो आखिरकार कलेजे में ऐसी आग बनकर धधकी कि उन्होंने दूसरे की आंखों में मिर्ची झोंकने से भी गुरेज नहीं किया। लताजी की गुजारिश से उनका कोई वास्ता नहीं था। इतना जरूर हुआ कि अंतत: माननीय सांसदों ने लताजी की गुजारिश पर गौर किया और लोकसभा के अंतिम सत्र के अंतिम दिन बताते हैं कि उन्होंने अपनी आंखों में पानी भर ही लिया। जो पांच साल तक एक-दूसरे के लिए आंखों से खून टपकाते रहे, अंतिम दिन उन्हीं आखों में भरपूर पानी था। वे एक-दूसरे की तारीफों के पुल बांध रहे थे और यह सोच-सोचकर उनकी आंखें भर आती थीं कि एक-दूसरे को खा जाने वाली नजरों से देखने के लिए अब हम पता नहीं मिलेंगे भी कि नहीं।

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