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मन में देव, देव में मन

पुराने समय में मूर्ति को अंधेरे में रखा जाता था, जिसे गर्भ गृह कहते थे। आप तभी भगवान की मूर्ति का चेहरा देख सकते थे, जब उसे दिए की रोशनी से दिखाया जाए। इसके पीछे का संदेश है कि आप को यह स्मरण रहे कि भगवान आपके मन की गहराइयों में बसता है। आपको उसे स्वज्ञान के माध्यम से देखना है। यह सच्चा सार है। प्राचीन समय में लोग प्रतिमाओं को बहुत सुंदरता से सजाते थे, ताकि आपका मन यहां-वहां न भटके और आप पूर्ण रूप से उस प्रतिमा से मोहित हो जाएं। वे संगमरमर से सुंदर मूर्तियां बनाते और उन्हें सुंदर वस्त्र और गहनों से सजाते थे। यह बाजार में जाने जैसा है। बहुत से लोग अब भी बाजार बस घूमने और देखने जाते हैं। वे सब सुंदर वस्तुएं देखते हैं और अच्छा अनुभव करते हैं। क्यों? क्योंकि मन सुंदर वस्त्रों, अच्छी महक, फूल, फल और बढ़िया खाने की ओर आकर्षित होता है। हमारे पूर्वज यह जानते थे, इसलिए वे ये सब वस्तुएं मूर्तियों के समीप रखते थे। वे मन को इंद्रियों के रास्ते पुन: वापस लाते थे और उसे भगवान की ओर केंद्रित करते थे।

बौद्ध धर्म में भी इसी प्रकार से मन को वश में किया जाता है, इसीलिए वे भगवान बुद्ध की और बोधिसत्व की अति सुंदर प्रतिमाएं बनाते हैं- हीरे, पन्ने, स्वर्ण और चांदी के साथ। वे फल-फूल, अगरबत्ती, मिठाई इत्यादि मूर्ति के सामने रखते हैं, ताकि मन और सारी इंद्रियां ईश्वर पर केंद्रित हों। एक बार मन ठहर जाता है, वे आपको आंखें बंद करके ध्यान करने को कहते हैं। यह दूसरा कदम है। ध्यान में आप भगवान को स्वयं में पाते हैं। जब कोई व्यक्ति पूछता है कि भगवान कहां है? बुद्धिमान व्यक्ति यह उत्तर देते हैं- मनुष्यों के लिए प्रेम ही भगवान है; बुद्धिजीवी ईश्वर को हर ईश्वरीय शक्ति और गुण में देखते हैं; कम बुद्धिमान उन्हें लकड़ी और पत्थर की मूर्तियों में देखते हैं, पर बुद्धिमान लोग भगवान को स्वयं में देखते हैं।

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