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जाटों को आरक्षण

आम चुनावों की विधिवत घोषणा से पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल कई अध्यादेशों को मंजूरी तो नहीं दे पाया, लेकिन जाटों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रस्ताव उसने जरूर मंजूर कर लिया। इसके बाद केंद्रीय नौकरियों में जाटों को पिछड़ी जाति का दर्जा मिलेगा और उसी श्रेणी के तहत वे आरक्षण के हकदार भी होंगे। सरकार चुनावों के पहले किसी को नाराज करने की स्थिति में नहीं है और यथासंभव सुविधाएं बांटकर अपने लिए वोट पक्के करना चाहती है। सरकार पर इसलिए दबाव था कि जाटों ने इस मुद्दे पर आंदोलन की धमकी दे दी थी और यह तक कह दिया था कि अगर आरक्षण नहीं मिला, तो वे कांग्रेस का बहिष्कार कर सकते हैं। जाट देश के नौ राज्यों में पाए जाते हैं और कुछ राज्यों में वे राजनीतिक लिहाज से काफी ताकतवर हैं। हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ इलाकों में जाटों का समर्थन राजनीतिक रूप से निर्णायक हो सकता है। इनकी तादाद आठ करोड़ से भी ज्यादा है और इनका राजनीतिक प्रभाव इनकी जनसंख्या के मुकाबले कहीं ज्यादा है। जाट मुख्यत: खेतिहर जाति है और जिन इलाकों में इनकी जनसंख्या है, उनमें काफी बड़े पैमाने पर वे जमीन के मालिक हैं। उन्हें हरित क्रांति का फायदा मिला है, इसलिए जाट किसान आम तौर पर संपन्न हैं, साथ ही संगठित भी हैं। वर्चस्व की वजह से राजनीति में इनकी उपेक्षा की हिम्मत कोई राजनीतिक पार्टी नहीं कर सकती, इसलिए स्वाभाविक ही था कि संप्रग-दो सरकार जाते-जाते उन्हें आरक्षण दे गई।

यह भारतीय राजनीति का विरोधाभास है कि जाटों को पिछड़े वर्ग में आरक्षण उनके दबे-कुचले या पिछड़े होने की वजह से नहीं, बल्कि प्रभुत्वशाली होने की वजह से मिला है। आजादी के तुरंत बाद दलित जाति और जनजातियों को जो आरक्षण मिला, वह जरूर समाज के दबे-कुचले और उपेक्षित वर्गों के लिए था और कई जनजातियां और दलित जातियां आज तक शोषण और अपमान झेल रही हैं। यह सही है कि मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के बाद भारतीय राजनीति में बड़े परिवर्तन आए और कम से कम उत्तर भारत में पिछड़ी जातियों को राजनीति में महत्वपूर्ण जगह मिली, लेकिन उसके बाद आरक्षण का राजनीतिक इस्तेमाल भी बढ़ा। इस इस्तेमाल का आधार किसी जाति या समूह का पिछड़ापन नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक हैसियत थी। लंबे वक्त तक जाट अपने को पिछड़ी जाति मानने के खिलाफ रहे हैं, वे किसी मायने में अपने को अन्य सवर्ण जातियों से कम नहीं मानते थे। लेकिन जब उन्होंने देखा कि कई अन्य जातियां पिछड़ा होने का फायदा उठा रही हैं, तब उन्होंने भी अपने को पिछड़ा कहलाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया।

जाटों का एक बड़ा वर्ग शैक्षिक-सामाजिक स्तर पर आरक्षण का लाभ उठाने के काबिल भी है, इसलिए भी इससे उनका भला होगा। जाट आरक्षण के लिए मुख्य आग्रह हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और केंद्रीय उड्डयन मंत्री अजित सिंह की ओर से था। हरियाणा में ओम प्रकाश चौटाला की पार्टी इनेलो हालांकि कमजोर हो गई है, फिर भी जाट वोटों के लिए वह पार्टी कांग्रेस की मुख्य प्रतिस्पद्र्धी है। इसी तरह, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अजित सिंह को इस बार भाजपा से बड़ी चुनौती मिल रही है। इसके अलावा, राजस्थान में अगर कुछ जाट वोट कांग्रेस के साथ आ गए, तो उससे विधानसभा की हार की थोड़ी-बहुत भरपायी हो सकती है। व्यापक नजरिये से उत्तर भारत में पिछड़ी और किसान जातियों का सशक्तीकरण एक अच्छी घटना है, लेकिन राजनीतिक नजरिये से आरक्षण का इस्तेमाल कई सवाल खड़े करता है।

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