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आर्थिक नीति और राजनीति

भारत की आर्थिक नीति क्यों हिचकोले खाती है? हमारे आर्थिक विशेषज्ञ इसका कारण विदेशी व्यवस्थाओं में ढूंढ़ते हैं। लेकिन इसकी वजह घरेलू समस्याएं हैं। ये समस्याएं हैं: गठबंधन राजनीति, राज्य बनाम केंद्र और सत्ता परिवर्तन के साथ बदलते समीकरण। ऐसे में, व्यवस्था में स्थिरता नहीं आ रही है और आरोप-प्रत्यारोप के चक्कर में सारे कामकाज ठप पड़े हैं। फिर देश विकास कैसे करेगा? इसलिए आर्थिक नीति को ठीक करने के लिए पहले राजनीति को दुरुस्त करनी होगी। उम्मीद है कि आगामी लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी या गठबंधन को स्पष्ट जनादेश मिलेगा। इसके साथ लालफीताशाही पर भी पाबंदी जरूरी है। अगर यह सब होता है, तो अपने आप विदेशी निवेशक भारत की ओर आकर्षित होने लगेंगे।
घनश्याम दास, भिलाई नगर, छत्तीसगढ़

सूचना देने में देरी

साल 2005 में जब केंद्रीय सूचना आयोग का गठन किया गया, तब इसके लिए सरकार ने बड़ी वाहवाही लूटी थी। यह कहा गया कि केंद्र ने जवाबदेही और पारदर्शिता का अधिकार जनता को सौंपा है। कांग्रेस के नेता कई जन-सभाओं में यह कहते थे कि हमारी सरकार ने सूचना का अधिकार लागू किया है, लेकिन हाल ही में इस आयोग की कार्यशैली पर सवाल उठे हैं। बताया जा रहा है कि सूचना आयोग कई जानकारियों को समय रहते देने में नाकाम साबित हो रहा है। यह भी आरोप है कि सूचना उपलब्ध कराने में देरी जान-बूझकर की जा रही है। वैसे यह भी सच है कि सूचना मांगने की अर्जी लगातार बढ़ती जा रही है। लेकिन इन सबके चलते नुकसान फरियादी को हो रहा है। अगर कानून है, तो मांगों का निपटारा भी समयबद्ध जरूरी है। यह केंद्रीय सूचना आयोग को समझना होगा। मुङो लगता है कि इस संदर्भ में एक कानून बनना चाहिए कि सूचना आयोग निश्चित समय में जानकारी उपलब्ध कराए।
शरद चंद्र झा,    दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

बदनीयत बैंक 

सरकार ने बैंकों की स्थापना आम जनता की भलाई के लिए की थी। लोगों में बचत की प्रवृत्ति बढ़ी और बैंकों में पैसा जमा करना वे ज्यादा सुरक्षित मानने लगे। सरकार ने बैंकों के कई उपक्रमों की शुरुआत की और ग्रामीण शाखाओं की भी शुरुआत की। लेकिन इस बीच प्राइवेट बैंक भी आ गए। वे सुविधाओं के नाम पर लोगों से पैसे ऐंठते नजर आए। इनकी लोक-लुभावन नीतियों के झांसे में ग्राहक आते गए और भारत में विदेशी बैंकों का बड़ा बाजार खड़ा हो गया। अब सरकारी बैंकों की तरह ये भी लोन देने लगे हैं। लेकिन कजर्दार इनसे परेशान हैं। उधर, गांवों में किसानों को कम दरों पर सरकारी बैंक ब्याज देते हैं, लेकिन ये ज्यादा कागजी कार्रवाई करते हैं। इससे बचने के लिए लोग प्राइवेट बैंक की शरण में जाने लगे हैं, जहां कई तरह के शुल्क हैं। अब तो आलम यह है कि अधिकतर बैंक सुविधा और ग्राहक की गलती के नाम पर शुल्क काटते हैं, खाता खुलवाने के लिए अधिक रुपये लेते हैं। सरकारी और प्राइवेट बैंकों का धंधा तो फल-फूल रहा है, लेकिन गांव से लेकर शहर तक ग्राहक मारे जा रहे हैं।
ब्रजमोहन, पश्चिम विहार, नई दिल्ली 

आत्मरक्षा के उपाय

बीते दिनों ‘आत्मरक्षा नहीं, सुरक्षा के उपाय जरूरी’ नजरिया पढ़ा। लेखिका ने आत्मरक्षा के उपायों को नाकाफी बताते हुए कहा कि यह समाज और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वे महिलाओं को सुरक्षित माहौल दें। मैं उनकी इस बात से सौ फीसदी सहमत हूं। लेकिन यह भी आवश्यक है कि महिलाएं आत्मरक्षा के उपाय जानें, क्योंकि विषम परिस्थितियों में ये उपाय उनके लिए मददगार साबित होंगे। केवल कानून के डंडे से बदलाव नहीं आने वाला, बल्कि महिलाओं का सहयोग भी जरूरी है। समाज में जिस तरह से हिंसा बढ़ी है, उससे लड़ने के लिए महिलाओं का सशक्तीकरण और उनकी जागरूकता, दोनों जरूरी हैं।
आसिफ खान, बाबरपुर, दिल्ली-32

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