DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

गठबंधन का दौर

देश में 1970 के उथल-पुथल के दौर के बाद गठबंधन की जिस राजनीति की शुरुआत हुई थी वह आज का बड़ा सच है। प्रत्येक चुनाव के साथ होने वाले गठजोड़ राजनीतिक मजबूरी को तो दिखाते ही हैं, लेकिन हकीकत यही है कि उनके बिना आज कोई राजनीतिक दल सत्ता में रहने की सोच भी नहीं सकता। आज जानिए गठबंधन की राजनीति का अतीत और वर्तमान।

कांग्रेस विभाजन 
आजादी के बाद से तीन लोकसभा तक कांग्रेस पार्टी के लिए सब कुछ सही रहा। देश के पहले तीनों आम चुनाव कांग्रेस पार्टी ने जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में लड़े और इसमें पार्टी सफल भी रही। वर्ष 1964 में नेहरू की मृत्यु के बाद कांग्रेस में उनके जितने कद का और कोई नेता नहीं था। दूसरी पंक्ति के नेताओं में सबसे पहले लाल बहादुर शास्त्री थे। 1966 में उनकी मृत्यु के बाद पार्टी ने मोरारजी देसाई के ऊपर इंदिरा गांधी को तवज्जो दी।

वर्चस्व को चुनौती
1967 में कांग्रेस के वर्चस्व को पहली चुनौती मिली। इस वर्ष विपक्ष संयुक्त विधायक दल के बैनर तले एकजुट हो गया और कई हिंदीभाषी राज्यों में कांग्रेस की हार हुई। तब पार्टी के अंदर इंदिरा गांधी की क्षमता पर सवाल उठे। इसके बाद कांग्रेस दो फाड़ हो गई। के. कामराज के नेतृत्व वाले धड़े को कांग्रेस (ओ) या पुरानी कांग्रेस कहा गया। चुनाव आयोग ने इंदिरा की अगुवाई वाले दल को ही असली कांग्रेस पार्टी का दर्जा दिया।

फिर हुआ विभाजन
वर्ष 1969 में राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की मृत्यु के बाद कांग्रेस ने तत्कालीन उप राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना दिया। दूसरी ओर, वी.वी. गिरि ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर राष्ट्रपति का पर्चा भरा। इंदिरा गांधी ने खुले तौर पर वी.वी. गिरि का समर्थन किया और रेड्डी चुनाव हार गए। इसके बाद कांग्रेस टूटी। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले धड़े को आईएनसी (आर) कहा गया और उनकी सरकार पर पकड़ कायम रही।

चुनाव अवैध ठहराया
1971 में ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के साथ इंदिरा सत्ता पर काबिज हुईं। 1975 में इंदिरा की लोकसभा चुनाव में जीत को कोर्ट ने अवैध ठहराया जिसके बाद देश में आंदोलन शुरू हुआ। इसके बाद इंदिरा ने आपातकाल की घोषणा कर दी। 1977 में जब देश में चुनाव हुए तो इंदिरा के नेतृत्व वाला दल कांग्रेस (आई) के नाम से चुनाव में उतरा।

सोनिया के समय बंटी: 1998 में सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा, लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद एक धड़ा सोनिया के विदेशी मूल को मुद्दा बनाते हुए पार्टी से अलग हो गया। इसमें शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर प्रमुख थे। इन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) बनाई।

जनता पार्टी
जनता पार्टी कई पार्टियों का समूह था, जो 1975 से 1977 के बीच देश में लगाए गए आपातकाल के खिलाफ थीं। इस पार्टी ने 1977 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस (आर) को हरा कर देश में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनाई थी।

कांग्रेस के खिलाफ: 1971 के आम चुनाव में जीत दर्ज करने बाद कांग्रेस ने इंदिरा गांधी के नेतृत्व में सरकार बनाई, लेकिन इस सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार और महंगाई चरम पर पहुंच गई। जनता इससे तो गुस्सा थी ही, 1975 में कोर्ट के इंदिरा के लोकसभा चुनाव को अवैध ठहराने से गुस्सा चरम पर पहुंचा। अपनी सरकार खतरे में देख इंदिरा ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी और विपक्ष के सभी बड़े नेताओं को जेल जाना पड़ा। आपातकाल खत्म होने के बाद आम चुनाव की घोषणा हुई। इस चुनाव में भाग लेने के लिए कई विपक्षी पार्टियों कांग्रेस (ओ), जनसंघ और लोकदल तथा कांग्रेस (आर) से अलग हुए नेता जनता पार्टी से जुड़े। इस चुनाव में राजनारायण ने इंदिरा गांधी को रायबरेली में हराया।

जनता पार्टी की सरकार
कांग्रेस की ऐतिहासिक हार के बाद जनता पार्टी ने सरकार बनाई और मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने। 1979 के मध्य में मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस दौरान अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जनता पार्टी से अलग हो गए थे। इसके बाद जनता पार्टी से अलग हुए भारतीय जनता दल के नेता चौधरी चरण सिंह देश के अगले प्रधानमंत्री बने। सिंह की सरकार अल्पमत की थी और कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था। विश्वास मत हासिल करने से पहले ही कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया। 1980 और 1984 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी समाजवादी नेता चंद्रशेखर के नेतृत्व में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रही।

नेशनल फ्रंट
1987 में जब वीपी सिंह को रक्षा मंत्री के पद से हटा दिया तो उन्होंने जन मोर्चा बनाया। जन मोर्चा में अरुण नेहरू, आरिफ मोहम्मद खान और मुफ्ती मोहम्मद सईद भी थे। जन मोर्चा राजीव गांधी सरकार में हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए था। 1989 के चुनाव से पहले जन मोर्चा, जनता पार्टी, लोकदल और कांग्रेस (एस) को एक साथ मिला कर जनता दल बना। इसके बाद वीपी सिंह ने कुछ वाम और दक्षिणपंथी पार्टियों के साथ मिल कर नेशनल फ्रंट बनाया और उनकी अगुवाई में सरकार बनी।

चौंकाने वाले नतीजे
1989 के चुनाव के परिणाम काफी चौकाने वाले थे। कांग्रेस को 197 सीटें मिलीं जो पिछले चुनाव के मुकाबले आधे से भी कम थी। जनता दल (143) दूसरे नंबर पर था। भाजपा की सीटें 85 तक आ पहुंची थी। वाम दलों के 45 सांसद थे। राजीव गांधी के सरकार बनाने से मना करने पर वीपी सिंह के नेतृत्व में नेशनल फ्रंट की सरकार वाम दल और भाजपा के सहयोग से बनी। 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद भाजपा के समर्थन वापस लेने की वजह से गिर गई।

तीसरा मोर्चा
1996 के चुनाव के बाद न कांग्रेस और न ही भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला था। अटल बिहारी वाजपेयी 13 दिन सरकार चला कर इस्तीफा दे चुके थे। इसके बाद 13 पार्टियों ने मिल कर यूनाइटेड फ्रंट बनाया। इस फ्रंट ने 1996 से 1998 तक दो सरकारें बनाईं। इन सरकारों में एचडी देवेगौड़ा (1 जून 1996 से 21 अप्रैल 1997) और आईके गुजराल (21 अप्रैल 1997 से 18 मार्च 1998) प्रधानमंत्री बने। इन सरकारों को कांग्रेस और टीपीडी बाहर से समर्थन दे रहे थे। दोनों बार कांग्रेस ने सरकार से समर्थन वापस लिया।

एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन)
1998 के चुनाव से पहले एनडीए बना। इस गठबंधन में 13 पार्टियां शामिल थीं। 1998 के चुनाव के बाद  अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, लेकिन एआईएडीएमके के समर्थन वापसी से सरकार 13 महीने ही चली। 1999 के चुनाव में एनडीए को पूर्ण बहुमत मिला। अटल प्रधानमंत्री बने।

यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन)
2004 के चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए यूपीए का गठन हुआ। कुल मिला कर यूपीए की 222 सीटें थीं। इसके बाद यूपीए की सरकार को वामदलों और समाजवादी पार्टी का बाहर से समर्थन मिल गया। यूपीए की ओर से देश के प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह। 2008 में यूपीए सरकार से वामदलों से समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद लोकसभा में आए विश्वास मत के दौरान समाजवादी पार्टी ने सरकार का साथ दिया और सरकार बच गई।

यूपीए-2
2009 के चुनाव में यूपीए को 262 सीटें मिलीं। 2009 से अब तक यूपीए-2 की सरकार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में चल रही है। सरकार को सपा और बसपा बाहर से समर्थन दे रही हैं। एनडीए की तरह ही यूपीए का कुनबा भी बड़ा-छोटा होता रहा है।

यूएनपीए
2008 में एनडीए और यूपीए से अलग दलों ने यूनाइटेड नेशनल प्रोग्रेसिव अलाइंस (यूएनपीए) बनाया गया, लेकिन जल्द ही इस गठबंधन में अलगाव हो गया। इसके बाद 12 मार्च 2009 को  फिर 10 पार्टियों ने मिल कर तीसरा मोर्चा बनाया, लेकिन यह प्रयोग अधिक सफल नहीं रहा।
- चुनाव डेस्क

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:गठबंधन का दौर