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गठजोड़ राजनीति की मजबूरी है

मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति में गठबंधन का कोई विकल्प नहीं है, किंतु यह राजनीतिक गलियारे की मजबूती है या मजबूरी, इस पर राजनीतिक विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। वरिष्ठ राजनीतिक स्तंभकार नीना व्यास से प्रवीण प्रभाकर की बातचीत।

मौजूदा भारतीय राजनीति में गठबंधन मजबूती का नाम है या मजबूरी का?
मजबूती बन सकती थी, पर बन गई है मजबूरी, क्योंकि विचारों का गठबंधन नहीं, बल्कि सत्ता का गठबंधन होता आया है। पहले के समय में यदि सरकार अच्छा करती थी, तो इसका सारा श्रेय एक पार्टी को जाता था, लेकिन गठबंधन के बाद अच्छे कामों की शाबाशी किसी एक पार्टी को मिलती है और गलतियों का भुगतान सब को करना पड़ता है। आसान हो गया है कि काम नहीं हो तो ठीकरा गठबंधन पर फोड़ दो। एनडीए और यूपीए में हमने यह देखा है। अगर इसे मजबूती की तरह लिया जाता, तो पूरे देश का वास्तविक प्रतिनिधित्व होता।

ऐसा क्यों नहीं हुआ, इसका कोई राजनीतिक कारण?
दरअसल, राज्य की राजनीति केंद्र पर हावी हो गई। जो गठबंधन की छोटी पार्टियां होती हैं, वे राज्य को अधिक अहमियत देती हैं। इससे केंद्र पर अनावश्यक दबाव बनता है। मौजूदा समय में तमिलनाडु में श्रीलंका की राजनीति चल रही है, जबकि यह विदेशी मुद्दा है और इस मामले में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले केंद्र सरकार और भारत की संप्रभुता को आगे रखना चाहिए। 20 साल पहले के गठबंधन में राज्यों की राजनीति उतनी हावी नहीं थी, लेकिन अब यह अधिक है। इसलिए राजनीतिक अस्थिरता और राजनीतिक फैसलों में देरी बढ़ी है।

ऐसे में, आम चुनाव में देश की जनता एक पार्टी को क्यों वोट नहीं देती?
जनता के सामने स्थानीय मुद्दे बड़े हैं। वह रक्षा, विदेश और वित्तीय घाटे से अधिक बिजली-पानी-सड़क और महंगाई जैसे मसले पर सोचती है। अगर हम यह बताएं कि वित्तीय घाटे और वैश्विक मंदी से खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़े हैं, तो लोग नहीं समझेंगे, जबकि महंगाई का बड़ा कारण यही है। एक कारण यह भी है कि राज्य की सरकारें और क्षेत्रीय पार्टियां स्थानीय मुद्दों को भी राष्ट्रीय स्तर पर जिंदा रखना चाहती हैं। इस बहाने उन्हें केंद्र से कुछ न कुछ मिलता रहता है। 

फिर कांग्रेस कई वर्षों तक कैसे अकेले शासन करती रही?
कांग्रेस का स्वतंत्रता-पूर्व लंबा इतिहास है। स्वतंत्रता संग्राम की अगुवाई इसी पार्टी ने की थी। स्वतंत्रता-पश्चात यह एक अमब्रेला पार्टी बनी, जिसमें राइट, लेफ्ट और सेंटर सभी धुरी के नेता थे। वहीं जनसंघ और आरएसएस जैसे संगठनों का स्वतंत्रता-संग्राम में विशेष रोल नहीं था। यूनाइटेड कम्यूनिस्ट पार्टी की भी कोई भूमिका नहीं थी। इन सबका फायदा कांग्रेस को मिला। इस पार्टी में कई बड़े दूरदर्शी नेता थे और उन सबको पंडित जवाहर लाल नेहरू साथ लेकर चल रहे थे।

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