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बंद होने के कगार पर है आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान!

पटना सिटी, हिन्दुस्तान प्रतिनिधि। अगमकुआं का ‘आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान’ प्रशासनिक उपेक्षा की वजह से बंद होने के कगार पर है। संस्थान में कई रोगों पर आयुर्वेदिक तौर-तरीकों से रसिरे्च होना था, लेकिन संसाधनों की कमी, जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण यहां रसिरे्च संभव नहीं है। वर्ष 1979 में स्वास्थ्य मंत्रालय के आयुष विभाग ने अगमकुआं के आरएमआरआई कैंपस में आयुर्वेद क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान की स्थापना की थी।

इसका उद्देश्य था कि आयुर्वेद पद्धति को एलौपैथिक पद्धति के बराबर खड़ा किया जा सके। साथ ही इस पद्धति से रसिरे्च हो और लोगों को फायदा पहुंचे। डब्ल्यूएचओ यहां रसिरे्च के लिए फं ड दे रही है। लेकिन प्रशासनिक सुस्ती व उपेक्षा से यह संस्थान अस्तित्व का संकट ङोल रही है।

बिहार व झारखंड में एकमात्र आयुर्वेद अनुसंधान वाले इस संस्थान में रोजाना 100 से 125 मरीज इलाज के लिए आते हैं। क्या थी सुविधाशुरू में यह संस्थान 25 बेड वाला अस्पताल था, जहां मरीजों को भर्ती कर रसिरे्च के हिसाब से इलाज किया जाता था।

पैथोलॉजी, फार्मेसी की सुविधा भी थी। बाद में केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान के निर्देश पर यहां एनिमिया, हाइपरटेंशन व क्षारसूत्र पर रसिरे्च शुरू हुआ। केरल के प्रसिद्ध नेत्र रोग अस्पताल की सहायता से टेलीआई मेडिसिन व जांच शुरू हुई। इसके लिए 50 लाख रुपए की मशीन खरीदी गई।

बिजली नहीं होने से यह मशीन खराब हो रही है। पंचकर्म पद्धति से इलाज शुरू करने के लिए वार्ड भी बनाया गया। साथ ही डॉक्टरों को प्रशिक्षित भी किया गया, मगर आज तक यह चालू नहीं हो सका।

क्या है परेशानी- संस्थान के पास विकास व रसिरे्च के लिए पर्याप्त फंड हैं, मगर अपनी जमीन नहीं है। अभी यह छह हजार स्क्वायर फुट में सिमटा है, जबकि संस्थान को कम-से-कम 20 हजार स्क्वायर फुट जमीन की जरूरत है।

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