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अदालत ने पीछा करने के कानून पर उठाए सवाल

नई दिल्ली। वरिष्ठ संवाददाता। वसंत विहार सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद महिलाओं का पीछा करने को गैर जमानती अपराध की श्रेणी में लाए जाने पर सवाल उठने लगे हैं। अदालत ने भी इस अपराध को गैर जमानती अपराध की श्रेणी में लाए जाने सवाल उठाते हुए इसे जल्दबाजी में लिया गया फैसला बताया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डॉ. कामिनी लॉ ने कहा है कि पीछा करने को गैर जमानती अपराध की श्रेणी में लाते वक्त इसके कई पहलू अनदेखे हैं।

उन्होंने सरकार से अनदेखे पहलुओं पर गौर करने के लिए एक व्यवस्था बनाए जाने निर्देश दिया है। अदालत ने छेड़छाड़ के मामले में एक व्यक्ति को दो साल कैद की सजा सुनाते यह आदेश दिया है। आरोपी पर अपनी पूर्व महिला मित्र का उसके शादी के बाद भी पीछा करने का आरोप था।

अदालत ने तिहाड़ जेल प्रशासन से दोषी व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक समस्या के निदान के लिए उसका इलाज कराने का भी निर्देश दिया है। पीछा करने के अपराध को गैर जमानती अपराध की श्रेणी में लाने के मसले पर अदालत ने कहा कि वसंत विहार सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद सरकार ने जल्दबाजी में यह कानून बनाया है।

साथ ही कहा कि जिसके कारण आपराधिक कानून संशोधन किया गया और पीछा करने को भारतीय दंड संहिता के तहत अपराध को गैर जमानती बताया गया। अदालत ने कहा है कि यह बड़ी दुर्भाग्यपूण बात है कि सरकार ने लोगों का गुस्सा शांत करने के लिए यह कदम जल्दबाजी में उठाया। लेकिन इससे जुड़े कई पहलुओं की अनदेखी की गई। अदालत ने सरकार से कहा है कि इसलिए एक ऐसी व्यवस्था बनाने की जरूरत है ताकि इसके सभी पक्षों पर विचार कर सके।

जहां तक इस मामले का सवाल है तो अदालत ने कहा कि दोषी अशोक सिंह का आचरण संतुलित नहीं था और इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि रिहाई के बाद वह बदले की भावना के साथ फिर से इस तरह के अपराध को अंजाम देगा।

अदालत ने कहा है कि इसलिए महिला की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस तरह के अपराध में दोषी व्यक्ति को कम से कम उसके पीछा करने के व्यवहार का इलाज होने तक समाज से दूर रखा जाना चाहिए।

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