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सोच में बदलाव का नतीजा है ये

वरिष्ठ पत्रकार अनीता कत्याल का कहना है कि पेशेवर लोग अब राजनीति को हेय दृष्टि से नहीं देखते, बल्कि उसे समाजसेवा मानते हैं। पहले वे इससे दूर ही रहते थे। सुशील राघव से उनकी बातचीत:

वर्तमान राजनीति के तौर-तरीकों में आए बदलाव को आप किस नजर से देखती हैं? क्यों आया है यह बदलाव?
राजनीति में आए इस बदलाव को आम आदमी पार्टी इफेक्ट माना जा रहा है। पहले शहरी और मध्य वर्ग का मतदाता वोट डालने भी नहीं जाता था। उसका मानना था कि राजनीति अच्छी चीज नहीं है। पिछले कुछ दिनों में इस सोच में बदलाव आया है। झिझक टूटी है। अब राजनीति को गंदा समझने वाले लोग ही इसमें आकर देश और समाज की सेवा करना चाह रहे हैं, इसीलिए पेशेवर लोग राजनीति से जुड़ रहे हैं।

इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे?
पेशेवर लोगों के आने से ऐसा नहीं है कि भविष्य में राजनीति बदल जाएगी, क्योंकि पार्टियों में शामिल होने वाले पेशेवरों की संख्या बहुत अधिक नहीं है। राजनीति में हर वर्ग का प्रतिनिधित्व होना बेहतर होता है, क्योंकि इससे हर वर्ग की आवाज सरकार तक पहुंचती है। हां, अगर कोई पेशेवर जमीन से भी जुड़ा है तो वह राजनीति के लिए ‘सोने पर सुहागा’ हो सकता है। जमीन से जुड़ने के लिए किसी भी व्यक्ति को लोगों के बीच में रह कर काम करना होता है और इसमें समय लगता है। वह अचानक से एक दिन में नहीं हो जाता।

अब राजनीतिक पार्टियों को लोगों तक पहुंचने के लिए नए-नए तरीकों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। अचानक से इसकी क्या जरूरत आन पड़ी?
सबसे पहली बात तो यह है कि लोग अब काफी जागरूक हो गए हैं। अब उन्हें पहले की तरह बहलाया-फुसलाया नहीं जा सकता। वे राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों से सवाल पूछने लगे हैं। उनकी इच्छाएं बढ़ गई हैं। सबसे बड़ी बात तो यही है कि अब उनका काम सिर्फ भाषणों से नहीं चलता। सोशल मीडिया ने इस काम में काफी मदद की है। उन्हें जागरूक किया है। इन माध्यमों के चलते नेताओं और लोगों के बीच की दूरी घटी है। इन सभी बातों के मद्देनजर राजनीतिक दलों को भी अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ा है। लोगों तक पहुंचने के लिए हर पार्टी अपनी सुविधा के मुताबिक माध्यम चुन रही है। राहुल गांधी ‘आउटरीच’ कार्यक्रम कर रहे हैं तो नरेंद्र मोदी ‘चाय पे चर्चा’ करके लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। 

आपको क्या लगता है, इन तरीकों से पार्टियों को लाभ होगा?
यह तो देखने वाली बात है कि राजनीतिक दलों को इसका कितना फायदा  मिलता है, लेकिन एक बात तो पक्की है कि वे यह समझ चुके हैं कि इन उपायों को अपना कर आम लोगों के बीच जगह बनाई जा सकती है। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में घर-घर जाकर प्रचार किया था, जिसका उन्हें फायदा भी मिला। उनकी ये कवायद सीटों में भी तब्दील हुई।

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