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मीडिया की जवाबदेही का दौर

नया दौर मीडिया की जवाबदेही का दौर है। इसलिए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की यह चिंता स्वाभाविक है कि मीडिया इस दौर में ‘पेड न्यूज’ (धन के बदले खबरें प्रकाशित करना) को बढ़ावा दे रहा है। पत्रकारिता के पवित्र पेशे में इसे गिरावट मानते हुए राष्ट्रपति ने इससे मुक्ति के लिए आत्म-सुधार की प्रक्रिया अपनाने की सलाह दी है। इंडियन न्यूज पेपर सोसाइटी (आईएनएस) के प्लैटिनम जुबली समारोह में राष्ट्रपति ने मीडिया की प्राथमिकताओं को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता बतलाई है, साथ ही जनता और जनसेवक के बीच मीडिया की ‘मध्यस्थ’ की भूमिका पर बल दिया है, जिस पर अमल करना कठिन है, लेकिन असंभव नहीं। देश के समक्ष राष्ट्रपति द्वारा प्रस्तुत विचारों और सवालों के केंद्र में मीडिया की निष्पक्षता, समाचारों को दबाने की प्रवृत्ति पर अंकुश, सनसनी से परहेज, सच्ची रिपोर्टिंग, नैतिकता के सर्वोच्च मानदंडों का पालन और विचारों को बिना किसी भय या भेदभाव के प्रसारित तथा विकसित करने की भूमिका जैसे प्रश्न प्रमुख थे। सत्य और तथ्य मीडिया की आत्मा हैं। मीडिया से यह अपेक्षा है कि वह सब कुछ को बिकाऊ मानकर हर माल दस रुपये, हर माल बीस रुपये बेचने वाले जैसा व्यवहार न करे। पाठक, श्रोता, दर्शक तक सत्य और तथ्य को पहुंचाना उसका सबसे पहला दायित्व है।

इस दृष्टि से राष्ट्रपति की सोशल मीडिया की सतर्क निगरानी की सलाह पर गंभीरता से गौर करना होगा। एक समाचार चैनल के स्टिंग ऑपरेशन से प्राप्त तथ्य जनमत सर्वेक्षणों का काला चेहरा उजागर करते हैं, जो धन उगाही का माध्यम बनने लगे हैं। सभी सर्वेक्षण गलत नहीं हो सकते, लेकिन इस कार्यक्षेत्र में घुस आए गैर ईमानदार लोगों और संगठनों पर रोक की जरूरत सर्वथा वाजिब है। ‘समाचार पत्रों द्वारा अनियंत्रित बाढ़ के पानी की तरह तबाही मचा सकने की आशंका’ महात्मा गांधी ने भी व्यक्त की थी। आत्म-सुधार के तंत्र का आशय मीडिया द्वारा खुद अपने व्यवहार की सीमा और मर्यादा तय करना है। इससे मीडिया सरकारी दमन और नियंत्रण से भी बच सकता है। प्रश्न केवल सरकारी नियंत्रण का नहीं, आज तो अनेक धर्म, जाति, राजनीतिक प्रतिबद्धता वाले संगठन भी पुस्तकों, प्रकाशनों पर सेंसर या नियंत्रण लागू करते हैं। मीडिया कर्मियों के लिए आत्म-नियंत्रण का पहला प्रयास इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स द्वारा वाशिंगटन में 1926 में हुई प्रथम पैन अमेरिकन प्रेस कॉन्फ्रेंस में किया गया, द हेग (नीदरलैंड) में 1931 में इंटरनेशनल कोड ऑफ ऑनर जारी हुआ।

1939 में प्रोफेशनल कोड ऑफ ऑनर बना। ऐसी कई और कोशिशें हुईं, लेकिन कोई भी प्रयास विश्व स्तर पर स्वीकार नहीं किया गया। मीडिया संगठनों, संपादकों, पत्रकारों के लिए आत्म-नियंत्रण एक सार्थक तरीका हो सकता है, पर भारत में इसके लिए की गई हर एक पहल नाकाम रही। भारत में ऑल इंडिया न्यूज पेपर एडीटर्स कान्फ्रेंस, एडीटर्स गिल्ड, प्रेस काउंसिल, सूचना प्रसारण मंत्रालय के साथ ही आपातकाल के दौरान थोपी गई आचार संहिताएं इतिहास की वस्तु बन चुकी हैं। इस तरह की आचार संहिता या आत्म-नियंत्रण के अभाव में मीडिया पर पहले भी अनेक संकट आए हैं।

आम चुनाव के माहौल में मीडिया को कोसने का चलन एक आम बात है। बड़े राजनीतिक दलों से लेकर छोटे-छोटे दल भी इसमें शामिल हैं। पिछले दो चुनावों के दौरान पेड न्यूज का सच उजागर होने पर समाचारपत्रों पर तो उंगलियां उठीं, राजनीतिक दलों और छोटे-बड़े नेताओं पर भी प्रमाण सहित आपेक्ष और आरोपों का जो सच सामने आया, वह चकित कर देने वाला था। देश के दो बड़े भाषायी समाचारपत्र समूहों पर खासे आरोप लगे। एक बड़े समाचारपत्र ने पहले पन्ने पर संपादक की ओर से खेल समाचारों को लेकर अपना पक्ष प्रस्तुत करते हुए कहा- ‘जब टेलीविजन और रेडियो पर समय बिकता है, तो उंगलियां नहीं उठतीं। समाचारपत्रों में स्पेस के बदले पैसा ऑन रिकॉर्ड वसूलने में हर्ज क्या है?’ पिछले आम चुनावों के दौरान भारतीय प्रेस परिषद ने पेड न्यूज की तहकीकात की। सारा सच एक लंबी रिपोर्ट में सामने आया, पर इस रिपोर्ट के बड़े हिस्से को काट-छांटकर ही इसे जारी किया गया। यह प्रकरण सरकारी कानून द्वारा गठित इस स्वायत्त संगठन की कार्यप्रणाली पर एक प्रश्नचिह्न खड़ा कर गया।

मीडिया को कोसते हुए जब इसे कुचलने की बात सामने आई और बात बढ़ी, तो केंद्रीय मंत्री अपने इस बयान से ही मुकर गए। गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और मीडिया के चमत्कारी प्रभाव और इसके बलबूते खड़ी आम आदमी पार्टी के नेता भी मीडिया से चिढ़े बैठे हैं। इसमें वे दल भी शामिल हैं, जो पेड न्यूज की कोशिशों में शामिल थे। खबर को दबा देने की प्रवृत्ति पर मीडिया की कड़ी स्पर्धा के कारण कुछ तो नियंत्रण हुआ है, पर राष्ट्रपति से पहले भी भारत के प्रधान न्यायाधीश ने पश्चिम बंगाल में एक छोटी दलित बच्ची के साथ बलात्कार के बाद उसकी हत्या की घटना को दिल्ली के निर्भया कांड की तरह मीडिया की बड़ी खबर न बनने पर चिंता व्यक्त की थी। क्या राजधानी में हुई घटनाएं ही आगे भी मीडिया की सुर्खियां या ब्रेकिंग न्यूज बनती रहेंगी? गरीबों-वंचितों से जुड़े मुद्दे भी क्या मीडिया के फोकस बनेंगे? पेड न्यूज का पूरा मामला ही छद्म (सरोगेसी) पर आधारित है।

कभी प्रायोजित फीचर, इंपैक्ट फीचर या एडवरटोरियल आदि के उल्लेख के साथ प्रकाशित होने वाली विज्ञापन सामग्री अब बिना किसी ऐसे उल्लेख के प्रकाशित होती है, तो अनेक विसंगतियां उजागर होती हैं। चुनावों में हम देख चुके  हैं कि एक पेड न्यूज में समाचार पत्र के एक ही पृष्ठ पर शब्दों और चित्रों में हाथी को कमल उखाड़कर फेंकते प्रस्तुत किया गया। ठीक पीछे के पृष्ठ पर साइकिल को हाथी पर सवार दिखाया गया है। यानी जो पैसा दे, वही जीत रहा, वे सभी जीत रहे। यह तो पाठक को ‘छद्म’ परोसना है। चार दशक पहले तक पत्रकारिता की यह अवधारणा बताई जाती थी कि शब्द ‘ब्रह्म’ है। आज इसी शब्द ब्रह्म को बिकाऊ  बनाने पर राष्ट्रपति की चिंता पूरे देश की चिंता को मुखर करती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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