DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

राजनीति की यह भाषा ही क्या हमारी नियति है

भाषा के प्रयोग में कौन कितना नीचे गिर सकता है, इन दिनों इसकी होड़-सी मची है। चुनाव प्रचार विचारों, सपनों और कार्यक्रमों पर विमर्श की बजाय सस्ती भाषा तक सीमित होते जा रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण विदेश मंत्री व कांग्रेस के कद्दावर नेता सलमान खुर्शीद ने भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को ‘नपुंसक’ कहकर पेश किया है। समर्थक और विरोधी आजकल इसी पर विमर्श कर रहे हैं। कुछ तो गीता के हवाले से नपुंसक कहे जाने को उचित ठहरा रहे हैं। गुजरात दंगों के समय मोदी की भूमिका के लिए उन्हें नपुंसक कहकर सलमान मुख्यमंत्री के रूप में उनके नाकारेपन को रेखांकित करना चाहते रहे होंगे। लेकिन उन्होंने जो शब्द चुना, उससे बात लैंगिक गाली तक सिमटकर रह जाती है। नस्लवादी घृणा की राजनीति को निशाना बनाने का सवाल पीछे रह जाता है। बहस मर्दवादी राजनीति व नपुंसकता के बीच फंस जाती है। उधर, बेहद शालीन छवि के मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने मोदी और राहुल गांधी की तुलना करते हुए एक को ‘मूंछ ’ का और दूसरे को ‘पूंछ’ का बाल कह दिया।

राजनीतिक भाषा की इस फूहड़ता की अभिव्यक्ति विधानसभाओं और लोकसभा में गाली-गलौज, मारपीट से लेकर काली मिर्च स्प्रे कांड तक में दिखाई देती है। अगर संसद के बाहर हम अभद्रता का अभ्यास करते रहें और संसद के भीतर भद्र हो जाएं, यह संभव ही नहीं। इस चुनाव में व्यक्तिगत टिप्पणियों की शुरुआत का श्रेय नरेंद्र मोदी को ही जाता है। उन्होंने राहुल गांधी को ‘शहजादा’ कहना शुरू किया, तो उनके करीबी अमित शाह ने राहुल को ‘पप्पू’तक कह डाला। फिर क्या था, पूरी पार्टी ही राहुल को पप्पू कहने लगी। जवाब में कांग्रेसी दिग्गज दिग्विजय सिंह ने मोदी को ‘फेंकू’ कहना शुरू किया। पूरी राजनीति पप्पू बनाम फेंकू पर टिक गई। बाकी बातें गौण हो गईं। स्वाधीनता संघर्ष के दौर में स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, अंग्रेजो, भारत छोड़ो, जय हिंद, तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा, इंकलाब-जिंदाबाद जैसे नारे दिए गए। आजादी के बाद भी देश में ऐसे राजनेता थे, जिनके पास देश को आंदोलित और उद्वेलित करने वाली भाषा थी। नेहरू का ‘आराम हराम है’, शास्त्री का ‘जय जवान-जय किसान’, या फिर राम मनोहर लोहिया का ‘जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं’ जयप्रकाश की संपूर्ण क्रांति जैसे नारों ने देश की जनता को उद्वेलित किया।

इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ में भी दम था। यहां तक कि राजीव गांधी भी 21वीं सदी का सपना दिखा सके थे। आज इसकी जगह बस घृणा और निंदा के जुमले उछाले जा रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने कभी इसे स्वीकारते हुए कहा था- यह जॉर्ज वाशिंगटन और लिंकन का समय नहीं है, नेहरू, सुकर्णों और सुहातरे का भी समय नहीं है। अब बौने राजनेता पैदा हो रहे हैं, इन्हीं से काम चलाइए। क्या सचमुच यही हमारी नियति है?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:राजनीति की यह भाषा ही क्या हमारी नियति है