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विज्ञान की बड़ी भूलें

आम धारणा यह है कि वैज्ञानिक सबसे बुद्धिमान लोग होते हैं और उनका कहा गलत नहीं हो सकता। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि ज्यादातर लोग विज्ञान नहीं समझते। विज्ञान का स्तर जितना ऊंचा होता है, उसे समझने वाले लोग उतने ही कम होते हैं। हालांकि कला व सामाजिक विज्ञान को भी लोग उतना ही कम समझते हैं, लेकिन हर कोई मानता है कि उससे ज्यादा जानकार कोई नहीं है। सच तो यह है कि वैज्ञानिक भी इंसान होते हैं, विज्ञान में भी ईष्र्या, द्वेष, टांग खिंचाई होती है, फर्जी कारोबार भी होते हैं। बड़े-बड़े वैज्ञानिक जितनी बड़ी खोजें करते हैं, उतनी ही बड़ी गलतियां भी कर सकते हैं। पिछले दिनों आई एक चर्चित किताब में पांच नामी वैज्ञानिकों की पांच बड़ी गलतियों की चर्चा है। ये वैज्ञानिक हैं- चाल्र्स डार्विन, फ्रैड हॉयल, लॉर्ड केल्विन, लाइनस पॉलिंग और अल्बर्ट आइंस्टाइन। गलतियां ऐसी हैं कि आश्चर्य होता है, इतने बड़े लोग कैसे इस तरह चूक गए?

गलतियां अक्सर वहां नहीं होतीं, जहां वैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर निष्कर्ष निकाले जाते हैं। गलतियां अक्सर अवधारणाएं गढ़ने में होती हैं, किंतु बड़े वैज्ञानिक वही होते हैं, जो उपलब्ध जानकारी को बिल्कुल अलग कोण से देखकर नई अवधारणा गढ़ देते हैं। यह अवधारणा तथ्यों के आधार पर जांची जाती है, लेकिन कभी-कभी वैज्ञानिक अपनी अवधारणा से इस कदर प्रभावित हो जाते हैं कि उसे सही साबित करने के लिए तथ्यों का भी विश्लेषण अपनी मर्जी से करने लगते हैं। चाल्र्स डार्विन के साथ यह हुआ कि जब उन्होंने प्राकृतिक विरासत का सिद्धांत बनाया, तो उसमें दो कमियां पाई गईं। पहली कमी यह थी कि उससे यह नहीं पता चलता था कि अनुवांशिक रूप से मिले गुण क्यों कभी तो अगली पीढ़ी में आते हैं और कभी एक-दो पीढ़ी छोड़कर प्रकट होते हैं। दूसरी आपत्ति यह थी कि ऐसे गुण क्यों कुछ पीढ़ियों के बाद गायब हो जाते हैं? डार्विन ने बाद में इन मुद्दों को हल करने के लिए पैनजेनेसिस नामक एक सिद्धांत गढ़ा, जो पूरी तरह गलत था।

इस समस्या को ग्रेगर मेंडल ने डार्विन के जीवन काल में ही हल कर दिया था, लेकिन डार्विन उनका शोध प्रबंध पढ़ नहीं पाए और अपनी गलत मान्यता पर डटे रहे। आइंस्टाइन की भूल इससे बिल्कुल उलटी थी। आइंस्टाइन ने जब अपना विश्वविख्यात सापेक्षता का सामान्य सिद्धांत प्रस्तुत किया, तो उन्होंने काल, दिन और गुरुत्वाकर्षण के बारे में दुनिया की समझ ही बदल दी। इस सिद्धांत को पेश करते समय आइंस्टाइन ने इसमें डार्क एनर्जी का सिद्धांत भी जोड़ा। बाद में आइंस्टाइन ने डार्क एनर्जी की अवधारणा को इसमें से हटा लिया, क्योंकि उन्हें वह गैर जरूरी महसूस हुई। आइंस्टाइन की मौत के बाद डार्क एनर्जी की अवधारणा फिर से विज्ञान में आई। तब माना गया कि आइंस्टाइन ने इस अवधारणा को जब माना था, तब वह ठीक थे और उसे खारिज करना उनकी भूल थी। आइंस्टाइन की मृत्यु के 50वें साल पर यह खोज हुई कि हमारे ज्ञात ब्रह्मांड का लगभग तीन-चौथाई डार्क एनर्जी है।

दरअसल, विज्ञान कोई अनोखी या आम लोगों की पहुंच के बाहर की चीज नहीं है। आसपास की दुनिया को जानने-समझने के तरीकों से ही विज्ञान बनता है। वैज्ञानिक वे होते हैं, जो कौतूहल और कल्पनाशक्ति के साथ बातों की गहराई से समझना चाहते हैं। इस मायने में वे अलग किस्म के कलाकार होते हैं, जो प्रकृति के भीतर की लय या रूपाकारों को खोजकर सामने लाते हैं। जैसे एक बड़ा लेखक एकाध खराब कहानी लिख सकता है या गायक कोई बुरी संगीत रचना कर सकता है, वैसे ही वैज्ञानिक भी गलतियां कर सकते हैं। जो गलती नहीं कर सकता, वह बड़ी रचना भी नहीं कर सकता।

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