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यूक्रेन और रूस

कोई भी पहले जैसा दिखना नहीं चाहता। यूक्रेन के मामले में मॉस्को अपनी भुजाएं चढ़ा रहा है, तो कई पश्चिमी देश यह दावा कर रहे हैं कि रूस सामान्य नजरिये से काम ले रहा है, यानी वह आक्रमण शब्द से इतनी असुरक्षा महसूस करता है कि अपने पड़ोसी देश को ‘बफर स्टेट’ बने रहने के लिए धकियाता रहता है। आने वाले समय में पश्चिमी देशों के इन दावों को गलत साबित करने का मौका रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के पास हो सकता है। यूक्रेन को अपनी सैन्य-ताकत से धमकाने और क्रिमिया में अशांति मचाने की बजाय वह यूरोप और अमेरिका के साथ मिलकर स्थिर यूक्रेन के निर्माण में योगदान दे सकते हैं। लेकिन यदि ऐसा नहीं होता है, तो क्या होगा? साफ है कि यूक्रेन की अस्थिरता रूस के लिए खतरा पैदा करेगी, क्योंकि दोनों के बीच कोई कुदरती सीमा नहीं है। पश्चिम को भी चाहिए कि वह रूस को इस मामले में अलग-थलग होने से रोके।

रूस के राजनीतिक सहयोगी विक्टर यानुकोविच जन-विद्रोह की वजह से यूक्रेन में अपनी सत्ता गंवा चुके हैं। इसलिए पुतिन को न्यौता दिया जा सकता है कि वह यूक्रेन की राजधानी कीव में नई सरकार की मदद करें। सोच्ची विंटर ओलंपिक्स की सफलता के बाद रूस सहयोग की मुद्रा में है, वह शीत-युद्ध के दिनों के संघर्ष से बाहर निकलता दिख रहा है। वैसे, रूस का भविष्य यूरोप से जुड़ा हुआ है। बावजूद इसके पुतिन का प्रयास है कि बेलारूस, कजाकिस्तान और यूक्रेन को मॉस्को-केंद्रित यूरेशिया संघ में लाएं। अमेरिका की तरह ही रूस एक महाशक्ति है और वह दूसरे देशों के साथ शक्ति साझा कर सकता है। पश्चिम को लेकर रूस का भय उसके लिए खतरा उत्पन्न करके दूर नहीं किया जा सकता। एक जर्मन कूटनीतिज्ञ बिटरलिच कहते हैं, ‘रूस को लगातार अपमानित करने से हमें बचना होगा।’ ऐसे में, यूक्रेन का संकट पुतिन के सामने एक अवसर पेश करता है कि वह पहले जैसा न दिखें। आज के देश शांति और समृद्धि के लिए एक-दूसरे पर अधिक निर्भर हैं। यूक्रेन को हराने या धमकाने की जरूरत नहीं है, बल्कि यह रूसी पहचान की अभिव्यक्ति का समय है, ताकि अन्य देश उसे सराहें।
द क्रिश्चियन साइंस मॉनिटर, अमेरिका

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