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महिलाओं को मिले महत्व

संसद में महिला आरक्षण विधेयक वर्षों से अटका पड़ा है। राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के सबसे ताकतवर नेता हैं और केंद्र में उनकी पार्टी की सरकार है। ऐसे में, उन्हें महिला आरक्षण पर अध्यादेश लाना चाहिए। वरना जनता उनसे पूछेगी कि उन्होंने महिलाओं के लिए क्या किया? यही नहीं, लोकसभा के चुनाव नजदीक हैं। जो अब तक नहीं हो पाया, वह अब क्यों नहीं हो सकता? महिला आरक्षण विधेयक जब आएगा, तब आएगा, प्राथमिकता तो यह होनी चाहिए कि कांग्रेस-भाजपा जैसे प्रमुख दल आगे आकर महिलाओं को 30 फीसदी टिकट देने का साहस दिखाएं। अगर वे ऐसा करते हैं, तो उनकी कथनी और करनी पर जनता भरोसा दिखाएगी। ऐसा लगेगा कि ये दल महिलाओं को वाकई ताकतवर बनाना चाहते हैं, अन्यथा नेताओं के भाषण झूठी वाहवाही लूटने तक सीमित दिखेंगे।
युधिष्ठिर लाल कक्कड़, लक्ष्मी गार्डन, गुड़गांव, हरियाणा

बाल-सुधार का सच

बीते दिनों यह खबर पढ़ने को मिली कि बाल सुधार गृह से फिर 40 बच्चे फरार हो गए, इसी से जुड़ी दूसरी खबर थी कि इससे एक मामले में हत्या के चश्मदीद भाई-बहन की जान को खतरा बढ़ गया है। इस तथाकथित बाल सुधार के नाम पर क्या हम समाज के लिए खतरे बढ़ा नहीं रहे हैं? जब यहां बच्चे सुधर नहीं सकते, तो फिर उन्हें वहां रखने का क्या फायदा? ताजा मामले में तो सुधरने की जगह वे मुजरिमों की तरह फरार हो गए और इससे अन्य निर्दोष लोगों की जान पर बन आई है। ऐसा लगता है कि बाल आरोपियों व अपराधियों को नाबालिग मानकर चलना समाज को नुकसान पहुंचाना ही है। कई जघन्य अपराधों में यह बात साबित हो चुकी है। इस पर भी विचार करना होगा कि जब एक ही बच्चा बार-बार अपराध करे, तो उसे ऐसे सुधार-गृह क्या सुधार पाएंगे? क्या ऐसे में हमारी व्यवस्था अपराध और अपराधियों को शह नहीं देती है?
ताराचंद ‘देव’ रैगर, श्रीनिवासपुरी, नई दिल्ली

हम बंटे हुए लोग

आज हमारा देश नस्लों, क्षेत्रों, जातियों में इतना बंट गया है कि सभी समस्याएं विकराल बन जाती हैं। हाल ही में दिल्ली में पूर्वोत्तर के लोगों पर हमले हुए, इसकी जितनी निंदा की जाए, वह कम है। पहले हमने देखा कि मुंबई में उत्तर भारतीयों पर हमले हुए। क्या सरहद पर लड़ रहा एक जवान यह सोचता है कि मैं किस क्षेत्र, किस जाति या किस मजहब का हूं? वह तो देश के लिए हंसते-हंसते शहीद हो जाता है। लेकिन हम नागरिक भेदभाव करने लगते हैं। हम अपने राष्ट्रगान को भूल जाते हैं, जो बताता है कि हमारा देश अनेकता में एकता को पिरोए हुए है। इसलिए ऐसी शर्मनाक घटनाओं को रोकने के लिए सख्त से सख्त कानून बनाए जाने चाहिए और उन पर अमल किया जाना चाहिए। सरकारों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे देश भर में जागरूकता अभियान चलाएं। पाठ्य-पुस्तकों में युद्ध की जगह भाईचारे का पाठ हो। अपने पर गर्व करना गलत नहीं है, पर इसके लिए दूसरों की तौहीन करना सरासर नाइंसाफी है।
कौशल किशोर दुबे, साहिबाबाद, गाजियाबाद

अपरिपक्व हैं अरविंद

अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देकर वही किया, जो उनके कुछ दिनों के भाषणों से उम्मीद थी। जन-लोकपाल के बहाने उन्होंने दिल्ली की कुर्सी छोड़ दी। यह उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता नहीं, तो और क्या है? आज भ्रष्टाचार की जड़ें काफी गहरी हो चुकी हैं और अरविंद एक जादू की छड़ी चाहते हैं, जो भ्रष्टाचार को समाप्त कर सके। इसलिए उनका फैसला बेवकूफाना और जल्दबाजी से भरा था। यदि वह दिल्ली में योजना बनाकर काम करते और तब भ्रष्टाचारियों पर लगाम लगाते, तो जनता का ज्यादा भला होता। मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देकर उन्होंने अच्छा कदम नहीं उठाया है। वह रणछोड़दास ही कहलाएंगे।
दिनेश गुप्त, पिलखुवा, उत्तर प्रदेश

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