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मनरेगा का भुगतान कराने वाले प्रतिनिधियों को कमीशन मिलेगा: जयराम

रांची। हिन्दुस्तान ब्यूरो। केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने मनरेगा मजदूरी के भुगतान की प्रक्रिया में सहजता और सरलता की जरूरत बतायी है। उन्होंने कहा है कि सीधा भुगतान लाभ हस्तांतरण (डाइरेक्ट बेनफिट ट्रांसफर) डीबीटी से भुगतान करने वाले बैंकों को दो प्रतिशत कमीशन दिया जाएगा। इसके लिए वे प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से बात करेंगे।

दो प्रतिशत के तहत एक प्रतिशत बैंक और एक प्रतिशत भुगतान कराने वाले व्यापारिक प्रतिनिधि को दिया जाएगा। यह व्यापारिक प्रतिनिधि स्वयं सहायता समूह या महिला स्वयं सहायता समूह के हो सकते हैं।

केंद्रीय मंत्री मनरेगा और राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा योजना को डीबीटी से जोड़ने के लिए शनिवार को रांची में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में बोल रहे थे। कार्यशाला का आयोजन केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा किया गया था। रमेश ने कहा कि बैंक तो आधुनिक हो गए हैं लेकिन डाकघरों को अभी आधुनिक होना है।

जबतक डाकघर आधुनिक नहीं होंगे, डीबीटी का लाभ लाभार्थियों को पूरा नहीं मिलेगा। जिनके पास आधार कार्ड नहीं है, उन्हें अंतरिम इंतजाम तक उनके मोबाइल नंबर के आधार पर भुगतान की व्यवस्था करानी चाहिए। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि मनरेगा को कृषि से जोड़ना चाहिए।

ऐसा नहीं हुआ तो सब ग्रामीण मजदूर बन कर रह जाएंगे। कोई कृषि कार्य करने वाला नहीं रह जाएगा। सोरेन ने कहा कि मनरेगा में तीन महीने में भुगतान मिलता है। इसलिए इसकी तरफ ग्रामीण रूचि नहीं दिखाते।

झारखंड की भौगोलिक स्थिति दुरू ह है इसलिए कई जिलों में तो मनरेगा से काम हो ही नहीं सकता। ग्रामीण स्तर पर व्यवस्था कैसे सुदृढ़ हो, यह हमारे लिए चुनौती है। यह चिंता का विषय है कि हमारे कार्यप्रणाली में कहीं न कहीं कमी जरूर है। अफसर गांवों में नहीं जाते हैं।

योजना, नियमावली बनाना आसान है। लेकिन उसे धरातल पर उतारना कठिन है। आज की कार्यप्रणाली गामीणों के अनुकूल नहीं है। आधारभूत संरचना की कमी है। महिलाओं को घर के अंदर मनरेगा का काम मिलना चाहिए।

मनरेगा को सफल बनाने के लिए सिस्टम कर सरलीकरण किया जाना चाहिए। दलालों के भरोसे ग्रामीणों को नहीं छोड़ना चाहिए। मनरेगा से नहरें बनायीं जानी चाहिए। राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री केएन त्रिपाठी ने कहा कि भुगतान में देरी के कारण ही मनरेगा मजदूरों को बिचौलियों का सहारा लेना पड़ता है।

राज्य में 40 लाख जॉब कार्डधारी हैं। यदि प्रति परिवार 150 रुपये मजदूरी दी जाए तो हर वर्ष राज्य में 6 हजार करोड़ रुपये खर्च होगा। लेकिन वर्तमान व्यवस्था के तहत हम 600 करोड़ भी खर्च नहीं कर पा रहे हैं।

त्रिपाठी ने केंद्र सरकार से अनुरोध किया कि झारखंड के लिए प्रतविर्ष 2000 करोड़ रुपये मनरेगा के लिए सुनशि्चित की जाए। जिलों में योजनाएं स्वीकृत नहीं होती। अफसर डरते हैं। केंद्र सरकार से समय पर राशि नहीं मिलती।

राज्य के लोगों की स्थिति को देखते हुए नियमों में शिथिलता बरती जानी चाहिए। ग्रामीण विकास की योजनाओं के क्रियान्वयन के आधार पर बड़े अधिकारियों के चरित्र रिपोर्ट लिखने की व्यवस्था करायी जा रही है। मुख्य सचवि रामसेवक शर्मा ने कहा कि मजदूरी के लिए ग्रामीणों को दौड़ लगानी पड़ती है।

यह दुर्भाग्य और जटिल प्रक्रिया है। व्यवस्था ऐसी को कि काम कर घर जाने से पहले सूचना मिल जाए कि मजदूरी खाते में पहुंच गयी है। मजदूरी की राशि निकालने में एक मजदूर का 20 प्रतिशत राशि खर्च हो जाती है।

बैंक से पैसा निकालने में 45 रुपये, एटीएम से 17 रुपये का खर्च एक आम आदमी पर पड़ता है। माइक्रो एटीएम से एक भी पैसा नहीं लगता। उन्होंने कहा कि राज्य के 4500 जन सुविधा केंद्रों पर माइक्रो एटीएम लगाए जाएंगे।

इससे घर पर ही मनरेगा मजदूरी और अन्य पेंशन मिल पाएगा। कार्यशाला को केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के संयुक्त सचवि आर सुब्रमण्यम, आंध्र प्रदेश की पोस्ट मास्टर जनरल संध्या कुमार सहित कई अन्य लोगों ने संबोधित किया। स्वागत राज्य के ग्रामीण विकास सचिव अरूण ने किया।

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